आकार व स्वाद सुगंध की दृष्टि से पान की कई किस्में प्रचलित हैं जैसे, मीठा पत्ता, मद्रासी, बनारसी, कपूरी आदि। स्वाद व पसंद के आधार पर खाने वाले लोग भी अलग-अलग होते हैं। पान मुंह का जायका और सांसों को ताजगी प्रदान करने के साथ-साथ मुख के कई विकारों में भी लाभप्रद साबित होता है।
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पान को संस्कृत में ताम्बूल कहते हैं। यह हमारे खान-पान, अतिथि सत्कार के रूप में प्राचीन काल से भारतीय संस्कार का अभिन्न अंग बनकर चला आ रहा है। इतना ही नहीं, पान पूजा का भी आवश्यक व अनिवार्य सामग्री के रूप में वैदिक काल से चला आ रहा है। ‘ताम्बूलम समर्पयामि’ का बार-बार उच्चारण भारतीय कर्मकाण्ड का अभिन्न हिस्सा बनकर आज भी सर्वत्र महिमामण्डित हो रहा है।
पान एक बहुवर्षीय बेल है, जिसका उपयोग हमारे देश में पूजा-पाठ के साथ-साथ खाने में भी होता है। खाने के लिये पान पत्ते के साथ-साथ चूना कत्था तथा सुपारी का प्रयोग किया जाता है। ऐसा लोक मत है कि पान खाने से मुख शुद्ध होता है, वहीं पान से निकली लार पाचन क्रिया को तेज करती है, जिससे भोजन आसानी से पचता है। साथ ही शरीर में स्फूर्ति बनी रहती है। भारत में पान की खेती लगभग 50,000 है0 में की जाती है। इसके अतिरिक्त पान की खेती बांग्लादेश, श्रीलंका, मलेशिया, सिंगापुर,थाईलैण्ड, फिलीपिंस, पापुआ, न्यूगिनी आदि में भी सफलतापूर्वक की जाती है।

पान के पत्ते में डाएस्टेस नाम का एंजाइम होता है जो स्टार्च को पचाने में मदद करता है। हम भारतीयों का खाना काफी स्टार्च युक्त होता है जैसे चावल, आलू आदि। पान में इस्तेमाल होने वाला कत्था एक एंटिसेप्टिक होता है जो दांत की बीमारियों को दूर रखता है। पान में अगर मुलेठी डालें तो गला साफ रहता है और स्वर बेहतर होता है, साथ ही एसिडिटी में भी फायदा होता है। इलाइची मुंह में स्वाद पैदा करती है और बदबू खत्म करती है, जिससे करीबियत में इजाफा हो सकता है। बड़ी सौंफ बदबू नाशक होती है और पाचन में मददगार होती है। लौंग भी दांत की बीमारियों को दूर करता है, इसे आयुर्वेद में स्तंभक यानी डिस्चार्ज में देरी लाने वाला कहा है।
कारण चाहे जो हो मगर पान खाने वाले या पान लगाकर बेचने वाले पान के पत्ते का डण्ठल, नोंक तथा मध्य भाग की मोटी नस निकालकर, धोकर व पोंछकर कत्था, चूना, सुपारी के साथ लगाकर देता है जिसे पान का बीरा कहा जाता है।
कहा जाता है कि पान की एक दर्जन जातियाँ तथा 300 प्रजातियाँ होती हैं किन्तु वैज्ञानिक दृष्टि से 5 या 6 किस्में होती हैं –
देसी, दिसावरी पान: इसमें करारापन, कम रेशे, हल्की कड़ुवाहट, स्वादिष्ट, पत्ता गोल व नुकीला होता है।
खाँसी पान: यह वन्य प्रजाति होती है। असमिया आदिवासी इसका औषधीय प्रयोग करते हैं। यह अपेक्षाकृत छोटा और अधिक कसैला होता है।
साँची पान: यह पान मोटा, हरा तथा अधिक रेशेदार होता है।
कपुरी पान: यह हल्का कड़ुवा होता है। पत्ती हल्के पीले रंग की होती है। यह प्रजाति हल्के पीले रंग की है तथा पत्तियाँ चबाना लोग पसंद करते हैं।
बांग्ला पान: इसका स्वाद कड़ुवा होता है। इसका पत्ता ह्रदयाकार गोला है। इसकी शिरायें मोटी तथा रेशेदार होती हैं। इसमें बांग्ला पानों की सभी किस्में शामिल होती है। पान के साथ जो आयुर्वेदिक औषधियाँ सेवनीय हैं वे बांग्ला पान के साथ ही ग्रहण की जाती हैं।
सौफिया पान: इसमें रेशे कम, कड़ुवा, सौफ की सुगंध तथा मीठे स्वाद का होता है। पत्ता गहरे हरे रंग का होता है।

पान अपने औषधीय गुणों के कारण पौराणिक काल से ही प्रयुक्त होता रहा है। आयुर्वेद के ग्रन्थ सुश्रुत संहिता के अनुसार पान गले की खरास एवं खिचखिच को मिटाता है। यह मुंह के दुर्गन्ध को दूर कर पाचन शक्ति को बढ़ाता है, जबकि कुचली ताजी पत्तियों का लेप कटे-फटे व घाव के सड़न को रोकता है। अजीर्ण एवं अरूचि के लिये प्रायः खाने के पूर्व पान के पत्ते का प्रयोग काली मिर्च के साथ तथा सूखे कफ को निकालने के लिये पान के पत्ते का उपयोग नमक व अजवायन के साथ सोने के पूर्व मुख में रखने व प्रयोग करने पर लाभ मिलता है।
इसमें क्लोरोफिल पर्याप्त मात्रा में होता है इसलिए इसके रस को निम्न दवाओं के रूप में भी प्रयोग किया जाता है।
पान के फायदे व औषधि प्रयोग
- पान पाचन शक्तिवर्धक तथा मंदाग्नि कब्जनाशक होता है
- यह गले संबंधी विकारों में भी लाभप्रद होता है, आवाज साफ करता है
- रक्त विकारों को दूर करता है व रक्तचाप नियंत्रित करने में सहायक है
- मुंह के स्वाद, जी मिचलाने आदि में उपयोगी होता है
- हृदयगति को नियंत्रित रखता है
- इसके प्रयोग से पेट के कीड़े नष्ट होते हैं
- मसूड़ों को पायरिया की बीमारी से बचाकर मजबूत बनाता है
- खांसी-सर्दी में इसके रस के साथ शहद खाने से लाभ मिलता है
- पान के बीड़े में काली मिर्च, मुलेठी व लौंग डालकर खाने से खांसी ठीक होती है
- मुंह के छालों में पान में कपूर का टुकड़ा डालकर चबाएं व पीक थूकते रहे, लाभ होगा
- पायरिया के लिए भी यह उपयोगी होता है
- पान के सेवन से, चूसते-चबाने से मुंह में लार बनती है जो पाचन क्रि या में सहायक होती है

पान प्रयोग की सावधानियां
- पान की गुणवत्ता नष्ट हो जाती है जब इसे जर्दे, तम्बाकू के साथ प्रयोग किया जाता है
- पान भोजन के पश्चात ही खाना चाहिए। खाली पेट इसे खाना ठीक नहीं
- इसका अधिक प्रयोग हानिकारक होता है। इससे मुंह व नेत्र संबंधी रोग हो सकते हैं
- पान के साथ अधिक सुपारी का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए
- पान के साथ कत्थे का अधिक प्रयोग फेफड़ों में खराश उत्पन्न करता है
- अधिक चूने की मात्रा आंतों व दांतों को नुकसान पहुंचाती है
- जिन लोगों को पेचिश, बुखार दांतों के रोग हो उन्हें पान का सेवन नहीं करना चाहिए
- यह उष्ण व पित्तकारक है
पान का रसायन
पान में मुख्य रूप से निम्न कार्बनिक तत्व पाये जाते हैं:
- फास्फोरस
- पौटेशियम
- कैल्शियम
- मैग्नीशियम
- कॉपर
- जिंक
- शर्करा
- कीनौलिक यौगिक
पान में पाये जाने वाले बिटामिनों में ए,बी,सी प्रमुख हैं।
पान में गंध व स्वाद वाले उड़नशील तत्व पाये जाते हैं, जो तैलीय गुण के होते हैं। ये तत्व ग्लोब्यूल के रूप में पान के “मीजोफिल” उत्तकों में पाये जाते हैं। जिनका विशेष कार्य पान के पत्तियों में वाष्पोत्सर्जन को रोकना तथा फफूंद संक्रमण से पत्तियों को बचाना है। अलग-अलग में ये गंध व स्वाद वाले तत्व निम्न अनुपात में पाये जाते हैं। जैसे- मीठा पान में 85 प्रतिशत सौंफ जैसी गंध, कपूरी पान में 0.10 प्रतिशत कपूर जैसी गंध, बंगला पान में 0.15-.20 प्रतिशत लवंग जैसी, देशी पान में 0.12 प्रतिशत लबंग जैसी ।
उल्लेखनीय है कि सभी प्रकार के पान में यूजीनॉल यौगिक पाया जाता है, जिससे पान के पत्तों में अनुपात के अनुसार तीखापन होता है। इसी प्रकार मीठा पान में एथेनॉल अच्छे अनुपात में होता है, जिससे इस प्रकार के पान मीठे पान के रूप में अधिक प्रयुक्त होते हैं।


