ब्रिटिश हुकूमत के दौरान ब्रिटेन में एक मशहूर पत्रकार व लेखक वेलेन्टाइन शिरोल ने अपनी किताब ‘इंडियन अनरेस्ट’ में तिलक को ‘द फादर ऑफ इंडियन अनरेस्ट’ कह डाला। तिलक इससे इतने नाराज हुए कि उन्होंने शिरोल पर मानहानि का मुकदमा कर दिया। हालांकि तिलक यह मुकदमा हार गए, लेकिन प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान दो साल तक शिरोल को इंग्लैंड से बाहर रहकर भारत में अदालत का चक्कर काटना पड़ा।
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वेंदात जो सन्यास का मार्ग माना जाता था, वह विवेकानन्द के मुख से घोर कर्मनिष्ठा का समर्थक बनकर उतरा और हिन्दुत्व का सारा दर्शन उनकी वाणी में प्रवृत्तिवादी हो उठा। किन्तु इस दिशा में दर्शन के स्तर पर सबसे बड़ा काम लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने किया। उन्होंने हिन्दु जाति में वह प्रेरणा भर दी, जिससे मनुष्य प्रतिकूल परिस्थितियों पर विजय पाता है।
बाल गंगाधार तिलक का जन्म 23 जुलाई 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के चिखली गॉव में हुआ था। ये आधुनिक कालेज शिक्षा पाने वाली पहली भारतीय पीढ़ी में थे। इन्होंने कुछ समय स्कूल और कालेजों में गणित पढ़ाया। वह अंग्रेजी शिक्षा के घोर आलोचक थे और वह मानते थे कि यह भारतीय सभ्यता के प्रति अनादर सिखाती है।
भारत में शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए तिलक ने दक्खन शिक्षा सोसायटी की स्थापना की। उन्होंने मराठी में मराठा दर्पण व केसरी नाम से दो समाचार शुरू किए जो जनता में बहुत लोकप्रिय हुए। उन्होंने मांग की कि ब्रिटिश सरकार तुरंत भारतीयों को पूर्ण स्वराज्य दे। केसरी में छपने वाली उनके लेखो की वजह से उन्हे कई बार जेल भेजा गया। वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए, पर 1907 में कांग्रेस का बंटवारा गरम दल और नरम दल में हो गया। 1908 में तिलक ने क्रांतिकारी प्रफुल्ल चाकी और खुदीराम बोस के बम हमले का समर्थन किया। इस वजह से उन्हें वर्मा की माण्डले जेल भेज दिया गया। 1916 में एनीबेंसेट और मुहम्मद अली जिन्ना के साथ उन्होंने अखिल भारतीय होमरूल लीग की स्थापना की।
समाज सुधार के क्षेत्र में भी तिलक जी बड़ा कार्य किया। उन्होंने बाल विवाह के विरूद्ध अभियान चलाया। राष्ट्रीय एकता की दृष्टि से हिन्दी को सम्पूर्ण भारत की भाषा बनाने पर जोर दिया। महाराष्ट्र में उन्होंने सार्वजनिक गणेशोत्सव और शिवाजी जयंती की परंपरा प्रारंभ की, ताकि स्वराज का संदेश जन-जन तक पहुंच सके, और लोगों में सांस्कृतिक एवं राजनीतिक चेतना जाग्रत हो सके। भारतीय संस्कृति, परंपरा और इतिहास पर लिखे उनके लेखों से भारतवासियों मे स्वाभिमान की भावना जाग्रत हुई।
इसके अलावा उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं, जिसमें वेदकाल का निर्णय, आर्यो का मूल निवास स्थान, गीता रहस्य, अथवा कर्मयोग शास्त्र, वेदों का काल-निर्णय और वेंदाग ज्योतिष, हिन्दुत्व, श्याम जी कृष्ण वर्मा को लिखे पत्र इत्यादि हैं।
सच्चाई यह है कि आचार्य शंकर अथवा शंकराचार्य ने उपनिषद और ब्रम्हसूत्र पर जो टीकाएं लिखी उनमें ज्ञान-मार्ग का निरूपण किया। इसी तरह से गीता पर जो शंकर भाष्य है, वह भी सन्यास का मार्ग है, संसार-त्याग का मार्ग है। इसमें कोई दो मत नहीं कि हिन्दुत्व के भीतर जो पलायनवादी दर्शन बतौर कालकूट व्याप्त था, उसे तात्विक रूप से विवेकानन्द और तिलक जी ने पहचाना। तिलक जी ने उसे देखा ही नहीं, बल्कि अपनी प्रखर बुद्धि से उसे दूर भी कर दिया। तभी तो रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा है- “गीता एक बार तो भगवान कृष्ण के मुख से कही गई, किन्तु दूसरी बार उसका सच्चा आख्यान लोकमान्य ने ही किया है।”
तिलक जी ने अनुसार सभी लोग यदि यह सोंचे कि उनको जो आखें दिखाएगां तो उसकी ऑखें निकाल लूगा, तो फिर युद्ध की इति हो चुकी। जैसा कि अपने शास्त्रों में भी कहा गया है, जो अपने साथ जैसा व्यवहार करें, उसके साथ वैसा ही व्यवहार धर्म है।
सच्चाई यह है कि तिलक जी को पता था कि यह देश इतने लम्बे समय तक मुसलमानों और फिर अंग्रेजों का गुलाम क्यों है? उन्हें पता था कि इसके पीछे हमारी पलायनवादी या स्वत: के मात्र मुक्ति की चिंता थी। इसीलिए उन्होंने गीता के माध्यम से कर्मयोग का पाठ पढ़ाया। अर्थात संसार को जानो, समझो और उसका मुकाबला करो।
तिलक जी ने यह बताया कि गीता में योग अर्थ कर्म है। योगी और कर्मयोगी दोनो शब्द गीता में समानार्थी है और इनका अर्थ युक्ति से कर्म करने वाला होता है। कुल मिलाकर तिलक जी ने अपना सम्पूर्ण जीवन देश की आजादी के लिए लगाया, उन्हें लंबे समय इसलिए जेल में कांटना पड़ा।
उन्होंने की कहा था -”स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।“ पर हमें स्वराज्य के साथ सुराज्य भी चाहिए। तिलक जैसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के बल पर स्वराज्य तो मिला, पर देश को अभी सुराज्य का इंतजार है। उम्मीद की जानी चाहिए कि नरेन्द्र मोदी जैसे कर्मयोगी के प्रधानमंत्री बनने से देश में सुराज्य की यात्रा चल पड़ी है, और तिलक जी का सपना साकार होगा।
अपने
निधन से ठीक तीन महीने पहले एक मई, 1920 को तिलक खुद ही गांधी से मिलने सिंहगढ़
पहुंचे थे। अपनी चिर-परिचित साफगोई में उन्होंने गांधी से कहा, ‘देखिए, मैं आपकी तरह सहिष्णु नहीं हूं। मैं
ईंट का जवाब पत्थर से देने में विश्वास करता हूं।’ उससे
थोड़े ही दिन पहले तिलक महाराज ने अपने निकट के सहयोगी दादासाहेब खापर्डे द्वारा
एनी बेसेंट को ‘पूतना की मौसी’ कहे
जाने को भी उचित ठहराया था।
01 अगस्त 1920 को मुम्बई में तिलक की
मृत्यु हो गई। मरणोपरात श्रद्धांजलि देते हुए उन्हें
गांधीजी ने आधुनिक भारत का निर्माता कहा, तो जवाहरलाल नेहरू ने भारतीय
क्रांति का जनक बताया। उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है,
कि उनके निधन पर लगभग दो लाख लोगों ने उनकी अन्त्योष्टि में
हिस्सा लिया।


