सरकार ने बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के लिए 70 हजार करोड रूपए देने की घोषणा भी की है ।
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जून में समाप्त तिमाही के दौरान सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 3 प्रतिशत रही है जो पिछले सात वर्षों में सबसे कम है और इस बीच बैंकों के विलय की घोषणा की गयी है। इसका उद्देश्य बडे बैंकों का निर्माण करना है। कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि बैंकों के विलय से ऋण के सुचारू प्रवाह के बजाय इनके कार्यकरण में बाधा पडेगी और कुछ समय के लिए ऋण का प्रवाह थम जाएगा। हालांकि वित्त मंत्री ने वायदा किया है कि ऐसा नहीं होगा किंतु ऐसी चीजें मंत्रियों के वश में नहीं होती। इस विलय के बाद सरकारी क्षेत्र के बैंकों की संख्या 27 से कम होकर 12 रह जाएगी।
आशावादियों का मानना है कि बैंकों के विलय से बडे पैमाने की अर्थव्यवस्था का लाभ मिलेगा और बैंकों के प्रबंधन में सुधार आएगा। इस बीच सरकार ने बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के लिए 70 हजार करोड रूपए देने की घोषणा भी की है किंतु लगता है कि केवल ढांचागत सुधारों से ही सरकारी क्षेत्र के बैंकों की स्थिति में सुधार आ पाएगा।

विशेषज्ञों के एक वर्ग का मानना है कि विलय का खतरा यह है कि कमजोर बैंकों की स्थिति में सुधार के बजाय कमजोर बैंक मजबूत बैंकों को डुबा सकते हैं। इससे पूर्व इस वर्ष विजया बैंक और देना बैंक का बैंक ऑफ बडौदा में विलय किया गया था किंतु उसके कार्य निष्पादन में कोई खास सुधार नहीं आया और इसको रोकने के लिए बैंकों को अधिक स्वायत्तता देने और यह सुनिश्चित किए जाने की आवश्यकता है कि बैंकों में पेशेवर दृष्टिकोण अपनाया जाए। साथ ही ऋण के वितरण में राजनीतिक हस्तक्षेप पर रोक लगायी जाए।
बैंकों के विलय की घोषणा के अनुसार ओरिएंटल बैंक ऑफ काॅमर्स और यूनाइटेड बैंक का पंजाब नेशनल बैंक में विलय किया जाएगा और इस विलय के बाद बैंक का कारोबार 17.85 लाख करोड तक पहुंच जाएगा और उसकी 11437 शाखाएं होंगी। सिंडिकेट बैंक का केनरा बैंक में विलय से उसका कारोबार 15.30 लाख करोड तक पहुंच जाएगा और उसकी 10324 शाखाएं होंगी। आंध्रा बैंक और कारपोरेशन बैंक के यूनियन बैंक ऑफ इंडिया के साथ विलय से पांचवा सबसे बडा सरकारी क्षेत्र का बैंक बनेगा और इसका कारोबार 14.59 लाख करोड तक पहुंच जाएगा।
इलाहाबाद बैंक का इंडियन बैंक के साथ विलय से उसका कारोबार 8.08 लाख करोड तक पहुंच जाएगा। केनरा बैंक और सिंडिकेट बैंक दोनों ही कर्नाटक स्थिति बेंक हैं औरउ न्हें अपने कारोबार को बढाने में समय लगेगा। जबकि पंजाब नेशनल बैंक यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया, ओरिएंटल बैंक ऑफ काॅमर्स, इलाहाबाद बैंक और इंडियन बैंक के साथ यह स्थिति नहीं है।

बैंकों के विलय से बउे पैमाने की अर्थव्यवस्था का लाभ मिलेगा किंतु विलय के साथ जुडे मुद्दों के कारण उसका अंतरिम लाभ प्रभावित हो सकता है। बैंकों के विलय से जुडा एक मुद्दा पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी उठाया है कि संघीय ढांचे में किसी भी निर्णय को लेने से पहले राज्य सरकारों और प्रुमख राजनीतिक दलों से परामर्श किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया का पंजाब नेशनल बैंक में विलय के कारण उसका मुख्यालय कोलकाता से चला जाएगा।
इसी तरह इलाहाबाद बेंक के विलय से उसका मुख्यालय कोलकातासे चेन्नई स्थानांतरितहो जाएगा। ममता बनर्जी ने कोलकाता स्थित इनबैंकों के विलय के कारण उनके कर्मचारियों के भविष्य पर चिंता व्यक्त की है क्योंकि इसे पूर्व स्टेट बैंक के अनुषंगी बैंकों का स्टेट बैंक में विलय के कारण 3500 से अधिक कर्मचारियों ने स्वैच्छिक सेवानिवृति लेली थी। इन बैंकों के विलय में सबसे बडी चुनौती उनके टेक्नोलोजी प्लेटफार्मों का एकीकरण और मानव संसाधन तथा सांस्क1तिक मुद्दों का प्रबंधन है।
विलय का सबसे आसान तरीका बैलेंस शीट को जोडना और टेªजरी का विलय करना है किंतु दो नेटवर्कों को एक बनाना कठिन है। इस संबंध में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष ने स्टेट बैंक के अनुषंगी बैंकों का स्टेट बैंक में विलय के संबंध में कहा था कि प्रत्येक अनुषंगी बैंक की अपनी संस्कृति है और उनमें 242 तरह की प्रौद्योगिकी प्रयुक्त होती है और उनहें एक ही प्लेटफार्म पर लाना कठिन है। इसिल बैंकों विलय कठिन है और विलय किए गए बैंकों को एक इकाई के रूप में कार्य करने के लिए कम से कम दो वर्ष चाहिए। बैंक ऑफ बडौदा के प्रबंधक निदेशक ने कहा है कि कोर बैंकिंग को मिलाने में कम से 12 से 18 महीने लगेंगे। इसलिए यह विलय इतना आसान और आकर्षक नहीं है। इसके अलावा बैंकों द्वारा लाभ पर बल देने के कारण हो सकता है वे दूरराज और पिछडे क्षेत्रों में शाखाएं न खोले जहां पर बैंकिंग की आवश्यकता है।
हमें यह बात ध्यान में रखनी होगी कि बैंकिंग प्रणाली को पेशेवर दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और बैंकों के बोर्ड में जो राजनेता निदेशक हैं उन्हें बैंकों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए विशेषकर बडे उद्योग घरानों को ऋण देने के बारे में। सरकार को बैंकों को अधिक स्वायत्तता देनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनका पेशेबर दष्टिकोण न बदले। बैंकों की अर्थक्षमता और लाभ आवश्यक है किंतु आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के आर्थिक विकास में उनकी भूमिका को महत्व दिया जाना चाहिए।इसी के चलते पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्टीªयकरण किया था और उसके बाद ग्रामीण क्षेत्रों तक बैंकिंग सुविधाएं पहुंची थी।
बैंक हो सकता है हमेशा लाभ पर ध्यान दें किंतु उन्हें सरकारी क्षेत्र के बैंकों के सामाजिक दायित्वों को नहीं भूलना चाहिए। कुछ विश्लेषक सरकारी क्षेत्र के बैंका की तुलना निजी क्षेत्र के बैंकों से करते हैं और कहते हैं कि सरकारी क्षेत्र के बैंकों का लाभ कम है किंतु निजी बैंकों का सामाजिक दायित्वन है और इसी के चलते उनका लाभ हमेशा अधिक रहता है। आने वाले वर्षों में कुछ सरकारी क्षेत्र के बैंकों को सामाजिक दायित्व के साथ अपने लाभ को बढाना होगा औ रसाथ ही बाजार में प्रतिस्पर्धी बना रहना होगा और यत हभी संभव है जब वे अपने पेशेवर दष्टिकोण को बनाए रखे और उद्योगपतियों तथार राजनेताओं के षडयंत्रों से दूर रहें।


