कार्ड्स किसी भी समारोह के क्यों न हों लेकिन हकीक़त में कुछ दिनों के के बाद उन्हें बेकार समझकर अमूमन किसी कूड़ेदान या घर के किसी कोने में डाल दिया या फिर धार्मिक छवि वाले कार्ड को तत्काल किसी नदी में प्रवाहित करने में हम जरा-सा भी विलम्ब नहीं करते। लेकिन गौर करने वाली बात है कि क्या हम उन बहुमूल्य कार्ड्स की वजह से उस प्रवाहित नदी के प्रदूषित होने वाले जल के बारे में कभी विचार करते हैं?
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शायद कभी नहीं या फिर दूसरों की जिम्मेदारी मानकर इतिश्री कर लेते हैं। मगर इस तस्वीर का दूसरा रुख यह भी है कि कुछ नया करने की चाह बेकार की चीजों में से भी कुछ नवीन या कोई यूनिक आइडिया तलाश कर ही लेती है।
जी हां, हम बात कर रहे हैं लखनऊ में रहने वाले कपिल यादव की। यह जवान छोरा जो आया तो था यहां अपने काम की तलाश में, लेकिन उसने अपनी सूझ-बूझ और सृजन के हुनर से एक नई सोच को जन्म दे दिया। उन्होंने पुराने कार्डों, अखबारों, पत्रिकाओं इत्यादि से कलात्मक व उपयोगी चीजों को न केवल बनाया अपितु एक नवीन तकनीक का सृजन कर उसे ‘कट एंड पेस्ट टू डेकोरेट’ नाम दिया यानी सजावट के लिए चीजों को काटो और चिपकाओ।

‘काटो और चिपकाओ’ की इस तकनीक से तैयार नाना प्रकार की कलात्मक वस्तुओं से एक ओर आप अपने और दूसरों के घरों को सजा सकते हैं। दूसरी ओर आप इसे हॉबी कोर्स के रुप में अपनाकर दूसरों को प्रशिक्षण दे सकते हैं। आप चाहें तो व्यवसाय के रुप में इसे अपनाकर आत्मनिर्भर भी बन सकते हैं।
‘कट एंड पेस्ट’ की तकनीक क्या है और इसकी भविष्य में क्या संभावनाएं हो सकती हैं? इन्हीं सबको को विस्तार से जानने के लिए हमने बात की कपिल यादव से। पाठकों के लिए प्रस्तुत हैं उस बातचीत की कुछ अंश:
‘कट एंड पेस्ट’ का विचार आपके मन में कैसे आया?

काम की तलाश में मैं गांव से लखनऊ आया हुआ था, यहां आकर नौकरी की तलाश करने के दौरान कार्ड्स को काटने की प्रक्रिया को नजदीक से देखा। मेरे मन में भी उनकी कटिंग से जुड़े विभिन्न पहलुओं और लीक से हटकर कुछ अलग बनाने की इच्छा हुई लेकिन कैंची कैसे पकड़ते हैं, कागज को किस तरह से काटा जाता है? इसका कोई आइडिया नहीं था। पहली बार कैंची पकड़ी, टेड़ा-मेड़ा ही सही हर आकार की कटिंग कर डाली और आज कैंची से खेलना (काम करना) मेरा पेशा तो है ही शौक भी है।
आप अपने इस काम में कौन-कौन सी बेकार की वस्तुएं इस्तेमाल करते हैं और किन चीजों के लिए बाजार पर निर्भर रहते हैं?
इसमें वेडिंग, बर्थडे, न्यू ईयर कार्ड्स, पुराने कैलेंडर्स, न्यूजपेपर्स, मैंगजीन्स आदि का इस्तेमाल अधिक होता है। इसके अलावा फेवीकोल, धारधार कैंची, पेन्ट, ग्लोसी पेपर्स, टैग, बटन, रिबन, टेप व अन्य सजावटी सामान को हम लखनऊ, दिल्ली, कोलकाता और मथुरा के बाजारों से मंगवाते हैं।
अब तक कौन-कौन सी वस्तुएं बना चुके हैं?

पुराने कार्ड्स से अलग-अलग तरह के लिफाफे (गिफ्ट व थीम बेस्ड), बुकमार्क, टैग्स, बैचेस, वाल हैंगिग, शो पीस, पेपर वेट्स, पेपर बैग्स व लैम्पस इत्यादि बनाये हैं।
इन आइटम को बनाते समय किन-किन बातों का ख्याल रखते हैं और किस तरह की मुश्किलें सामने आती हैं?
कई बार कटिंग करते समय डिजाइन्स अलग हो जाती हैं इसलिए कटिंग करते समय सजग रहना बेहद जरुरी होता है। इसके साथ आइटम सुन्दर और आकर्षक भी दिखने चाहिए, वजह यह है कटिंग तो सभी कर लेते हैं लेकिन सफाई वाली कटिंग (कुशाग्रता से कटिंग) सभी के लिए मुश्किल होटी है और मेरा मानना है कि अगर सजगता और कुशाग्रता आपके काम में है तो आप उस चीज को बना सकते हैं जो आपको ही नहीं सामने वाले को भी स्वतः आकर्षित करेगी। कई चीजें तैयार करने में काफी वक्त लग जाता है इसलिए धीरज भी रखना होगा। दरअसल मुश्किलें तो हर काम में आती हैं। चूंकि शीशे को दबाना और मोड़ना संभव नहीं है इसलिए शीशे के आइट्म तैयार करने में अनेक मुश्किलें आती हैं। इसके अलावा हम वेस्ट मेटेरियल से जो चीजें तैयार करते हैं, उनकी अत्यधिक डिमांड होने से हमें कई आर्डर कैंसिल भी करने पड़ते हैं।

आप क्या छात्र-छात्राओं को प्रशिक्षित करते हैं और क्या आपने किसी प्रदर्शनी में भी हिस्सा लिया है?
लखनऊ में लगभग 8-10 स्कूल-कालेज जैसे एपी सेन कालेज, आर्ट्स कालेज, स्टडी हाल, अवध डिग्री कालेज आदि में छात्रों को कट एंड पेस्ट के बारे में जानकारी दी है और उन्हें प्रशिक्षण भी दिया है। इसके अलावा नारी शिक्षा निकेतन के एनएसएस कैम्पस और राजभवन लखनऊ में आयोजित शाक एवं पुष्प प्रदर्शनी में हमें सम्मिलित होने का अवसर भी मिला है।
बच्चों के लिए यह तकनीक किस तरह से लाभप्रद है?
कोई भी इस काम को कर सकता है, लेकिन बच्चों के लिए यह बहुत रुचिकर और लाभप्रद है। वे अपनी छुट्टियों के दौरान अपने फ्रेंड्स व रिलेटिव्स के लिए बर्थडे कार्ड्स, गिफ्ट्स व अन्य कलात्मक चीजें बना सकते हैं। इससे उनके समय का सदुपयोग होगा। अपनी बनाई चीजों से अर्जित प्रशंसा उन्हें आगे बढ़़ने और कुछ नवीन करने की प्रेरणा भी देगी।
आजकल क्या-क्या बना रहे हैं? और कुछ नया बना रहे हैं?
आजकल नोट्सबुक्स, लाइटिंग रंगोली बेहद लोकप्रिय है, जिसके लिए हमने पुराने बेकार कम्प्यूटर फ्लोपीज और ऑडियो कैसेटस का इस्तेमाल किया है। इसके अतिरिक्त पुराने फायल रोल्स, मोटे वेडिग कार्ड्स, कलर्ड शीट्स, कलर्ड मैगजीन्स से तैयार कोस्टर्स, पेनस्टैंड्स, फोटोफ्रेम, नेपकिन बास्केट्स ये समस्त चीजें भी लोग बहुत पसंद कर रहे हैं। अलग-अलग आकार के भगवान श्रीगणेश की लगभग 1000 कार्ड्स अब तक मैं तैयार कर चुका हूं और आजकल पुराने रिकार्ड्स से कुछ नया करने की योजना है। देखते हैं क्या नया बनता है।

इस विधा के साथ-साथ आप पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए जागरुकता अभियान भी चला रहे हैं, लोगों को क्या संदेश देते हैं?
किसी भी चीज का उपयोग करने के बाद यह आप पर निर्भर करता है कि किस तरह से आप उसका सही इस्तेमाल करते हैं। आज के आधुनिकीकरण और तकनीकी युग में अनेक सुविधाएं हैं, अनेकानेक माध्यम हैं, लेकिन आजकल शादी-विवाह जैसे सुअवसरों पर अत्यधिक वृहत आकार और अधिक से अधिक पृष्ठों के वेडिंग कार्ड्स छपने का चलन है, जिनमें अत्यधिक रासायनों का भी इस्तेमाल होता है। जितना अधिक पृष्ठ इस्तेमाल करेंगे उतने ही अधिक पेड़ कटेंगें और यदि नदी में इन्हें प्रवाहित करते हैं तो यूज्ड केमिकल्स नदी के जल को प्रदूषित कर देंगे। इसलिए सभी से गुजारिश है कि कम से कम पेपर का प्रयोग करें और इस्तेमाल करने के बाद उसे दोबारा प्रयोग में लायें। सच मानिए, हमेशा एक नवीन वस्तु आपके समक्ष तो होगी ही, साथ ही स्वच्छ, स्वस्थ और सुरक्षित पर्यावरण में आपका यह अमूल्य योगदान आजीवन आपको आनंदित करता रहेगा।


