प्राचीन काल में जो वानर मानव के सहयोगी, मित्र और रक्षक की भूमिका में होते थे, वही आज मानव के प्रतिद्वंद्वी हो गए हैं। बंदर अब पेशेवर अपराधियों की तरह पेश आने लगे हैं। वे काट रहे हैं, कपड़े फाड़ रहे हैं, कई लोगों की मौत भी हो चुकी है। आलम यह है कि पिछले साल शीतकालीन सत्र से पहले सरकार को एक सर्कुलर भी जारी करना पड़ा था कि “संसद परिसर में बंदर सामने आए तो उससे आंख न मिलाएं और बंदर से डर कर न भागें वरना वो हमला कर सकता है।”
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पौराणिक मान्यता कहती है कि सभी जीवधारी किसी दैवी शक्ति से उत्पन्न हुए हैं पर आधुनिक युग के डार्विन बाबा अपनी किताब ऑरिजिन ऑफ स्पेशीज में तय कर गये हैं कि बंदर आदमी का पूर्वज है। वैसे भी देख लीजिये आज भी हमारा ये पुरखा अपने वंशजों यानि हमारी नकल करने में ऐसा माहिर दिखायी देता है कि नकलची शब्द बंदर से चिपक-सा गया है।
प्राचीन मान्यता के हिसाब से एक ऐसा भी समय रहा होगा जब मानव कायदे से विकसित हो चुका होगा और बंदरों की प्रजातियां भी धरती पर बची रही होंगी, तब शायद मानव रूप में अपने नये विकसित रूप की कद काठी और कौशल के आगे नतमस्तक होकर तब के वानर राज सुग्रीव राम की सहयोगी सेना बनने को तैयार हो गये होंगे। यही नहीं हनुमान, अंगद, जामवंत, नल, नील जैसे वानर शिरोमणियों ने मानव के साथ धरती पर तालमेल की ऐसी प्रेरक कथा का विषय दे दिया कि ये धरती सभी जीवधारियों के लिये है और सहजीवी परजीविता यानी ‘जियो और जीने’ दो के सिद्धांत पर दुनिया चलनी है।
पर पता नहीं क्या असंतुलन आ गया कि आज बंदर ने आदमी को परेशान करना शुरू कर दिया है। हिमालय पर्वत श्रंखला से लेकर अरावली, विंध्याचल, सतपुड़ा से लेकर नीलगिरी पहाड़ियों और वनों तक में आजाद और खामोश विचरने वाले इन बंदरों ने अब शहरों का रुख कर लिया है। आज कलयुग में जैसा आदमी कर रहा है वही बन्दर नक़ल कर रहे हैं।

सबसे पहले उत्तर की हिमालय पर्वत श्रृंखला की बात करें तो उत्तराखंडवासी बंदरों के उत्पात से बेहाल हैं। तीन दशक पहले पहाड़ों से ऐसी खबरें नहीं मिला करतीं थीं। शायद कलयुग में वानरों ने सीमा रेखा तय कर रखी हो- शहर तुम्हारे, जंगल हमारे। अपनी बेलगाम जरूरतों को पूरा करने के लिये जब आदमी ने जंगलों में घुसना और प्राकृतिक संसाधनों का बेशर्म दोहन शुरू किया होगा तभी कुपित वानर सेनाओं ने शहरों का रुख किया होगा।
उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले से बंदरों के अजीबोगरीब किस्से आजकल अखबारों की सुर्खियां बने हैं। अल्मोड़ा के दवा व्यवसायी सुधीर हरबोला बताते हैं, ‘दाज्यू, पहाड़ की खेती तबाह कर डाली है बंदरों ने। खीरा उगाते हैं तो बानर सेना तब तक छिप कर घात लगाये रहती है जब तक खीरा पांच छह इंच का न हो जाये। फिर मौका देख कर टूट पड़ते हैं। खाते कम, उजाड़ते ज्यादा हैं। खीरा क्या कोई भी सब्जी लगाओ, उसका यही हाल करते हैं। धान की फसल को उस समय बर्बाद कर जाते हैं जब उसकी कटाई का समय आता है। घरों में तो मुकाबले के लिये वहां के बाजारों में गुलेल खूब बिक रही है। पर पहाड़ के नालीदार खेतों की रखवाली कैसे हो।’
शहर की तर्ज़ पर पेड़ काटे जा रहे हैं और ऊंचे भवनों का निर्माण हो रहा है। ऐसे में स्वाभाविक है कि बंदर जाएं तो कहां जाएं? भोजन-पानी बंद होने की नौबत आते ही वे शहर की ओर रुख़ करने लगते हैं।
अल्मोड़ा की द्वाराहाट तहसील के वकील अजय हरबोला और शिक्षक भूषण हरबोला कहते हैं, ‘यूपी के मैदानों ने अपनी मुसीबत पहाड़ों में ठेल दी है। तीस साल पहले तक ऐसा नहीं था। वहां के शहरों में जब बंदरों के उत्पात बढ़े तो मैदानी अफसरों ने कलंदरों से पकड़वा कर पहाड़ों में छोड़ दिया। ये सोच कर कि उन्हें वहां अनुकूल हैबीटेट मिलेगा तो आबादी को परेशान भी नहीं करेंगे।
पर हुआ उलटा क्योंकि रहने को स्वच्छंद आवास तो बंदरों को मिल गया खाने के लिये पर्याप्त सामग्री का अभाव था। सो खेतों और घरों पर उनके हमले शुरू हो गये। उस पर बंदरों की उत्पत्ति की प्रवृत्ति इतनी तेज होती है कि आबादी बढ़ती ही जा रही है। रामनगर के गैबुआ गांव निवासी वकील नरेन्द्र कुमार पाठक का कहना है कि बंदरों का ये जलवा तराई के इलाके हलद्वानी से शुरू होता है और रामनगर, भिकियासैंण से लेकर चौखुटिया, रानीखेत और नैनीताल तक पसरा पड़ा है।

अब वहां के नागरिकों की गुहार पर अल्मोड़ा के नगर पालिका अध्यक्ष प्रकाश चंद्र जोशी ने डीएम से बंदरों के बंध्याकरण की मांग की है। अल्मोड़ा का कोई मोहल्ला ऐसा बचा हो जहां के बुजुर्ग या बच्चों ने बंदरों के दांतों का प्रसाद न पाया हो। नगर पालिका अध्यक्ष जोशी के मुताबिक वन्य जीव प्रतिपालक ने उन्हें बताया है कि बंदरों के बंध्याकरण के लिये 50 लाख रुपये का बजट आवंटित कर दिया गया है। इसमें से 22 लाख रुपये के उपकरण क्रय भी कर लिये गये है। अब कार्रवाई शुरू होने को है। शिक्षक भूषण हरबोला कहते हैं कि कार्रवाई करेंगे कैसे? बंध्याकरण के लिये बंदर को पकड़ना जरूरी है। पहाड़ की उंची नीची डगर पर पकड़ना बड़ी चुनौती होगी।
सबसे दिलचस्प हाल है कृष्ण की क्रीड़ास्थली वृंदावन का। बंदरों के उत्पात से वृंदावनवासी ऐसे सहमे हुए हैं कि हर घर जाल से ढका चिड़ियाघर नजर आता है। गनीमत ये है कि मंदिरों, बाजारों में चहलकदमी करने वाले नर-नारी सुरक्षित तो कहे जा सकते पर उनका बटुआ, पादुका, लत्ता या चश्मा कतई सुरक्षित नहीं है। इनमें से कोई सामान उनके हत्थे लग गया तो वहीं आसपास मंडराता बृजवासी बालक आपसे कहेगा-

-चश्मा मिल जायेगो, बीस रुपैया निकारो।
-क्या करोगे ?
-फ्रूटी मंगवाओ।
-बंदर फ्रूटी कैसे पियेगा?
-हवाल देखो।
बच्चा फ्रूटी का टैट्रापैक लाया और उसे बंदर की ओर उछाल देता है। बंदर उसे लपक कर उसी तरह पी जाता जैसे हम और आप। फिर आपका चश्मा छोड़ अगले शिकार की तलाश में निकल लेगा। चश्मा अगर छज्जे पर रह गया तो वही बालक कहेगा- सीढ़ी मंगवाओ, 30 रुपैया लगिंगे। बगल से ही सीढ़ी आ जायेंगी। लो जी बंदरों ने दो बालकों को रोजगार तो दे ही दिया अपना पेट पालन भी कर लिया।
बंदर यूं तो मूलतः शाकाहारी जीव है पर आगरा में घटी एक घटना दर्दनाक रही जहां बंदर एक मां की गोद से 12 दिन के दुधमुंहे बच्चे को छीन कर ले गया जिससे उसकी जान चली गयी। बंदरों का ऐसा कौतुक सचमुच में भयभीत करने वाला है। आगरा क्या प्रदेश के अन्य धार्मिक स्थलों चाहे वो अयोध्या हो या बनारस या फिर चित्रकूट सभी जगह अपना हक ऐत्थे रख वाले अंदाज में आदमी पर हमलावर है बंदर आज।

ये छोटे शहर तो छोड़िये यूपी की राजधानी लखनऊ के पाश हजरतगंत इलाके के एक व्यवसायी अमित त्रिवेदी के घर में जब एयर गन रखी देखी तो पूछा ये क्यों ? तो बोले, ‘क्या करें बंदरों को भगाने के लिये रखी है चलाते नहीं है बस दिखा देते हैं तो बंदर भाग जाते हैं’। राजधानी के एक और पाश इलाके गोमतीनगर में भी साल भर पहले एक दुखद घटना हो चुकी है। जब बंदरों को भगाने के प्रयास में एक व्यक्ति की छत से गिर कर मृत्यु हो चुकी है।
इस इलाके में तो ये हाल है कि बंदर मौका देखकर घरों में धुस कर बाकायदा फ्रिज खोल कर सामान निकाल कर गृहस्वामी को झिकाते हुए बाहर निकल जाते हैं। लखनऊ विधानभवन हो आकाशवाणी या कोई और सरकारी कार्यालय वहां लंगूर के साथ आने वाले कलंदरों के लिये बजट आवंटित किये जाने लगे हैं। काले मुंह बाले लंगूर से लाल मुंह वाले बंदर डरते हैं और बंदरों से निजात दिलाने के लिये ये कलंदर दस हजार रुपया महीना फीस लेते हैं।
बिहार के आरा समेत कई शहरों में भी बंदरों के आतंक की ख़बरें हैं। पिछले वर्ष लोगों की शिकायत पर वन विभाग द्वारा शहर से बंदरों को पकड़ा गया था, लेकिन फिर से यहां बंदरों की संख्या में इजाफा हो गया है। शहर के नवादा, कर्मन टोला, महावीर टोला, पकड़ी, बंधन टोला, आदि जगहों पर बंदर का डेरा रहता है। ताक में रहते हैं और मौका मिलते ही घरों व खिड़की में से मोबाइल, बर्तन, कपड़ा, किचन में घुसकर कर खाने को तहस नहस कर देते हैं। शहरवासी इनकी हरकतों से परेशान हैं।
आए दिन शहरवासियों को बंदर अपना निशाना बना रहे हैं। तीन माह में 65 लोग एंटी-रैबीज के इंजेक्शन लगवाने के लिए आरा सदर अस्पताल में पहुंच चुके हैं। इसके बावजूद नगर निगम और प्रशासन, वन विभाग के अधिकारी इस समस्या को इतने हल्के में ले रहे हैं कि कई महीने से बंदर पकड़ने वाले को ही शहर में नहीं बुलाया जा रहा है। शहर में इतनी दहशत फैली होने के बावजूद जिम्मेदार लोग अभी भी बंदर पकड़ने वाले को बुलाने की बजाय योजना बनाने में ही जुटे हैं।
गाज़ियाबाद में भी कमोबेश ऐसी ही स्थिति है। बंदरों का आतंक थमने का नाम नहीं ले रहा है। वसुंधरा और वैशाली में आए दिन बंदरों का झुंड लोगों पर हमला कर देता है। लोगों को घर से बाहर निकलने से पहले यह देखना पड़ता है बंदर बाहर है कि नहीं। बंदरों का डर लोगों में इस कदर बढ़ रहा है कि वे पार्क में, छत पर, घर के बाहर गेट पर खड़े होने तक से कतराते हैं। लोगों का कहना है जब भी बंदरों को लेकर शिकायत करते है तो एक विभाग दूसरे विभाग में शिकायत करने को कहता है। बंदरों की वजह से कॉलोनी में बच्चों ने खेलना तक छोड़ दिया है। अब तक बंदरों का झुंड दर्जनों लोगों पर हमला कर उन्हें घायल कर चुका है।
उत्तर प्रदेश के आगरा में एक बंदर द्वारा 12 दिन के बच्चे को उसकी मां की गोद से उठाकर ले जाने और पटककर मार देने की घटना के दो दिन बाद कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और पर्यावरणविदों ने बुधवार को बंदरों को वन्यजीव अधिनियम के तहत संरक्षित प्रजाति की सूची से निकालने की मांग की। इसी क्रम में आगरा में बंदरों के खतरे पर आयोजित एक सम्मेलन में यह मांग की गई।
इस सम्मेलन को संबोधित करते हुए सत्यमेव जयते के न्यासी मुकेश जैन ने कहा कि एक दशक से हम मांग कर रहे हैं कि बंदरों को जंगलों में छोड़ा जाए और उनकी नसबंदी करने की व्यवस्था की जाए, लेकिन अब तक हम सरकारी अनुमति हासिल करने में विफल रहे हैं। उन्होंने कहा कि बंदरों को वन्यजीव अधिनियम 1972 के तहत संरक्षित प्रजातियों की सूची से निकालना चाहिए। आगरा नगर निगम के मुताबिक, शहर में बंदरों की संख्या 25,000 से ज्यादा है।
बंदर के काटने को हलके में मत लीजिए क्योंकि बंदर के काटने से भी रेबीज जैसी खतरनाक बीमारी होने का खतरा बना रहता है।
देश के रेलवे स्टेशनों और कार्यालयों में भी यात्री व कर्मचारी बंदरों के आतंक से परेशान हैं। बंदर खाने-पीने की वस्तुएं हाथ से छीन ले जाते हैं। कई यात्रियों और कर्मचारियों को जख्मी भी कर चुके हैं। बंदरों के कारण एक कर्मचारी की इज्जतनगर कारखाने में जान भी जा चुकी है। इज्जतनगर रेल कारखाना के अंदर बंदरों को काफी बड़ा झुंड है, जिसमें 250 से अधिक बंदर होने का अनुमान है। ये बंदर अक्सर यूनिट में धावा बोल देते हैं। बरेली जंक्शन पर कई बड़े पेड़ हैं।
रेल अधिकारियों का कहना है कि इन पेड़ों पर 50 से ज्यादा बंदरों ने आशियाना बना रखा है। रेल अफसर लगातार नगर निगम और वन विभाग को पत्र लिखकर बंदरों को पकड़ने की गुहार लगा रहे हैं। मगर कोई भी विभाग इस ओर ध्यान नहीं दे रहा। बंदरों को पकड़वाने की मांग गोरखपुर रेल मुख्यालय तक जा चुकी है।
वहीं देश की राजधानी नई दिल्ली का रक्षा मंत्रालय तक बंदरों की उछलकूद से परेशान है। वहां बंदरों को दूर भगाने के लिए सुरक्षा कर्मियों का सहारा लिया जाता है। दिल्ली के कई और इलाके भी बंदरों के आतंक से पीड़ित हैं पर उन की कहीं सुनवाई नहीं होती है।
वैसे ऐसा नहीं है कि बंदरों को रोकने के लिए कोई कोशिश नहीं हुई। जुलाई 2014 में राज्य सभा में उस वक़्त के शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडु ने बताया था कि एनडीएमसी बंदरों को भगाने के लिए रबर की गोलियों का इस्तेमाल कर रही है और 40 प्रशिक्षित लोगों को बंदर भगाने का काम सौंपा गया है। ह्यूमन लंगूर कहलाने वाले ये लोग मुंह से लंगूर की आवाज़ निकालकर बंदर भगाते हैं।
बंदरों से मुक्ति पाने के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा धर्मपरायण लोगों की धार्मिक भावनाएं भी आड़े आ जातीं हैं। कारण ये है कि वानर वंश को हनुमान जी की सेना माना जाता है। इसलिए मोर, गाय की तरह बन्दर भी अबध्य होते हैं। उनका बंध्याकरण तो किया जा सकता है पर एक नट की तरह लचीले और फुर्तीले बन्दर को इस ऑपरेशन के लिए काबू में कैसे किया जाये?
यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तो अनौपचारिक बातचीत में बंदरों के उत्पात से बचने के लिए एक बार एक दिलचस्प सलाह दे डाली और वो ये कि हनुमान चालीसा का पाठ करिए भाग जायेंगे। पर इस समस्या इस चश्मे से भी देखा जाना चाहिए कि वन क्षेत्रों या ग्रामीण क्षेत्रों के बढ़ते शहरीकरण ने बंदरों को उनके प्राकृतिक आवासों को छीन लिया है। आज न उनके पास रहने को घने जंगल हैं न खाने को फल फूल या कांड मूल। उनकी जगह छीनोगे तो यही होगा जो आज हो रहा है।

इसीलिए फ़िलहाल तो गुलजार के गाने की लाइनों के मुताबिक बन्दर आज सिकंदर बना हुआ है, आदमी की तरह।
गाने की लाइनें हैं :
आदमी है बन्दर, रोटी उठा के भागे।
कपडे उठा के भागे कहलाये वो सिकंदर।
आदमी है क्या बोलो आदमी है क्या।


