महात्मा गांधी ने कहा था कि क्लीन इंडिया बनाने के लिये हर देशवासी को हाथ से हाथ मिला कर कड़ी मेहनत करनी चाहिये। पर अगर हर देशवासी सफाई के प्रति लापरवाह हो जाये। तो कितने भी सफाई कर्मी तैनात कर लीजिये स्वच्छ भारत का सपना पूरा नहीं किया जा सकता।
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बचपन में करीब तीस साल पहले देश के जाने माने जन्तु विज्ञानी प्रोफेसर भूमित्र देव ने जर्मनी में तीन साल प्रवास के बाद वहां के जो संस्मरण सुनाये थे उनमें से एक आज भी याद है। उन्होंने बताया कि वहां सड़कें शीशे की तरह साफ होती हैं। मैने जिज्ञासावश पूछा अगर किसी को खांसी हो। प्रोफेसर बोले तो वो अपने रूमाल या टिशू पेपर का कोन बना कर उसमें कफिंग करता है। फिर डस्टबिन आने पर उसे वहां फंेक देता है। वहां सफाई कर्मी हैं, गलती करने पर जुरमाना भी है। पर हर नागरिक अपनी तरफ से यह जिम्मेदारी समझता है कि उसे अपना शहर गंदा नहीं करना। जर्मनी का यह संस्मरण इसलिये भी भाया क्योंकि परिवार के बुजुर्गों ने भी हमेशा स्वच्छता का पाठ पढ़ाया था। अमूमन सारे घरों में खासकर गांव गिरांव में दिन में दो बार सुबह और शाम झाडू़ बुहारू का दैनिक कार्यक्रम होता ही है।
साफ सफाई सभी की दिनचर्या का आवश्यक हिस्सा रहा है। पर देखने में ये आ रहा था कि सफाई का यह सिविक सेंस केवल घरों तक ही सीमित रहा है। आम नागरिक की सोच ये रही है कि मेरा घर साफ रहे बाकी सड़क, पार्क, पहाड़, नदी या तालाब गंदे होते हैं तो मेरी बला से। आजादी के बाद से ही अधिकांश नागरिकों का यह बेपरवाह नजरिया ही भारत खासकर उत्तर भारत के चुनिंदा शहरों को कुरूप बना रहा था। दक्षिण भारत हो या पूर्व या पश्चिम वहां के सभी शहर आज कचरे के ढेरों से घिरे नजर आते हैं। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ या ऐसे किसी शहर जहां पान का शौक हो, कोई कार्यालय, स्कूल, अस्पताल, पार्क, गली, बाजार ऐसा नहीं मिलेगा जहां पीक के दर्शन न हों। मनाही के बावजूद चोरी से पीक देने का कुटिल आनंद लेने वाले भी कम नहीं। आजकल कारों में अमिताभ बच्चन स्टाइल ओपन बार बना कर दूसरों के घरों के आगे चोरी से बीयर या दारू की बोतल, प्लास्टिक के गिलास और खाने की झूठी प्लेटें फेंक कर निकल लेने का नया चलन शुरू हुआ है।

यह काम वर्ष 2014 की गांधी जयंती से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो शुरू कर दिया है। उन्होंने हर देशवासी से स्वच्छ भारत अभियान का अंग बनने का आह्वान किया है। महात्मा गांधी ने कहा था कि क्लीन इंडिया बनाने के लिये हर देशवासी को हाथ से हाथ मिला कर कड़ी मेहनत करनी चाहिये। पर अगर हर देशवासी सफाई के प्रति लापरवाह हो जाये । तो कितने भी सफाई कर्मी तैनात कर लीजिये स्वच्छ भारत का सपना पूरा नहीं किया जा सकता। पहले बापू और अब मोदी ने खुद हाथ में झाडू़ लेकर देशवासियों को यह समझाने की कोशिश की है कि सफाई किसी एक वर्ग की ही जिम्मेदारी नहीं बल्कि हरेक शहरी का यह दायित्व बनता है कि कम से कम वो गंदगी तो न फैलाये। यह काम छोटे लोगों का ही नहीं सभी का है और बहुत बड़ा काम है।
इस विशाल अभियान को अंजाम तक पहुंचाने के लिये केन्द्र सरकार अपने दूसरे कार्यकाल में भी कोई कोर कसर बाकी नहीं रख रही है। सभी सरकारी, गैर सरकारी और निजी प्रयासों को पूरी मदद देने को तैयार है। हरेक नागरिक को बस यह समझना होगा कि घर के साथ ही बाहर की सफाई एक सामाजिक जिम्मेदारी है। प्रधानमंत्री कहते हैं कि यह काम किसी एक के बस का नहीं है। देश के सवा सौ करोड़ देशवासियों को मिल कर ही यह काम करना होगा। गंदगी के कारण ही हर देशवासी हर साल पांच हजार रुपये दवाओं पर खर्च करता है। ऐसा विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट में कहा गया है।
पर क्लीन इंडिया अभियान को साकार करने के लिये अभी लम्बा सफर तय करना है। हो सकता है कि आदत के गुलाम अधेड़ों को सफाई का सबक सीखने में परेशानी हो। ऐसे में इस अभियान का फोकस घर और स्कूल को भी बनाया जाना चाहिये। हर घर में माता पिता अपने बच्चों को शुरू से ही स्वच्छता का पाठ पढ़ायें साथ ही उन्हें यह सिखायें कि घर के बाहर भी स्वच्छता रखना उतना ही जरूरी है। अभिभावकों के साथ ही शिक्षक भी स्कूल में बच्चों को सफाई के मैनर्स सिखाये। पांच दस सालों के बाद जब यही बच्चे बड़े होकर समाज का हिस्सा बनेंगे तब नयी पीढ़ी क्लीन इंडिया या स्वच्छ भारत के संस्कार के साथ सामने आयेगी। हम भारतीय जब विदेशों में जाते हैं तो वहां सफाई के सारे कायदे कानून सिर झुका कर मान लेते हैं। पर अपने देश में कचरा फैलाने में शान समझते हैं। आइये ये मान लें कि क्लीन इंडिया सबकी जिम्मेदारी है।


