भले ही सर्फ एक्सेल की सफेदी का ऐसा चमत्कार हो कि दाग ढूढने के लिए कोई कम्पटीशन भी करना पड़े लेकिन सफेदी और स्वास्थ्य का कारक दूध काला पड़ता जा रहा है। और दूध की इस कालिख के लिए कुछ और नहीं बल्कि वही सफेद पाउडर जिम्मेदार है जिसका इस्तेमाल करके दाग साफ करने का दावा किया जाता है।
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एक पुरानी कहावत है ढाक के तीन पात। नकली दूध के संदर्भ में यह कहावत बिलकुल फिट बैठती है यानी कितनी भी कोशिश कर लो, व्यवस्था में कोई ख़ास सुधार होने वाला नहीं है। इसी के मद्देनजर 2 जुलाई को एक बार फिर उच्चतम न्यायालय की जस्टिस के एस राधाकृष्णन एवं जस्टिस पिनाकी चंद्र बोस की दो सदस्यीय पीठ ने मिलावटी व रासायनिक दूध की देश में धड़ल्ले से हो रही पैदावार व बिक्री पर अपनी गहन चिंता जताई है।
उच्चतम न्यायालय ने इस संबंध में विशेष रूप से दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड की राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि वे बताएं कि उनकी सरकारें मिलावटी दूध पर रोक लगाने के लिए क्या कर रही हैं।
गौरतलब है कि केंद्र सरकार ऐसे मिलावटी व ज़हरीले दूध के उत्पादन व बिक्री पर रोक लगाने हेतु अपनी जि़म्मेदारी से पल्ला झाड़ चुकी है तथा अदालत को यह बता चुकी है कि इस पर रोक लगाने की जि़म्मेदारी राज्य सरकारों की ही है। अदालत ने अपनी ताज़ा-तरीन दूध संबंधी चिंताओं में यह भी स्वीकार किया है कि दूध में हो रही इस मिलावट का कारण मांग और आपूर्ति का अंतर भी है। लिहाज़ा उच्चतम न्यायालय ने राज्य सरकारों को इस मिलावटखोरी के धंधे पर रोक लगाने हेतु आवश्यक कार्रवाई किए जाने पर ज़ोर दिया है।

किसी ज़माने में भारत में शुद्ध दूध की पर्याप्त मात्रा में उपलब्धता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसे दूध-दही की नदियां बहने वाला देश कहा जाता था। दूध का कारोबार करने वाले लोग दूध में मिलावटखोरी अर्थात् केवल पानी की मिलावट करने तक को पाप की श्रेणी में गिनते थे। परंतु लगता है शायद हमारे देश में दूध व दही की इस प्रचुर मात्रा में उपलब्धता को किसी की नज़र लग गई है। या फिर लालची होते जा रहे दूध व्यापारियों अथवा मिलावटखोरों की सरकार द्वारा की जा रही अनदेखी,खाद्य सुरक्षा से जुड़े विभाग के लोगों की रिश्वतखोरी, दूध की अत्यधिक बढ़ती मांग व इसकी आपूर्ति के मध्य आने वाले विशाल अंतर तथा बेतहाशा बढ़ती जा रही मंहगाई आदि की वजह से दूध जैसा सबसे पवित्र, पौष्टिक एवं महत्वपूर्ण समझा जाने वाला खाद्य एवं पेय पदार्थ मिलावटखोरी की भेंट चढ़ गया है।
भैंसों की निजी डेयरी तथा खुला दूध बेचने वालों द्वारा की जाने वाली मिलावटखोरी की तो बात ही क्या देश में चलने वाली कई सहकारी डेयरियां व मिल्क प्लांट तक के जो नमूने जांचे गए हैं उनमें भी रासायनिक या सिंथेटिक पाए गए हैं।
गौरतलब है कि दूध में मिलावटखोरी का सबसे सीधा,सस्ता व आसान उपाय तो इसमें पानी की मिलावट करने का है। ऐसा नहीं है कि पानी की मिलावट करने से दूध केवल पतला मात्र हो जाता है बल्कि इससे दूध की पौष्टिकता तथा इनमें पाए जाने वाले विटामिन,प्रोटीन आदि में भी भारी कमी आ जाती है। इसके अतिरिक्त दूध में मिलाया जाने वाला जल कितना शुद्ध,स्वच्छ तथा कीटाणु रहित है यह भी मिलावट किए जाने वाले पानी पर निर्भर करता है। ज़ाहिर है मिलावटखोर व्यक्ति दूध में मिलावट करने हेतु स्वच्छ पानी की तलाश कतई नहीं करता।
इसके अतिरिक्त नकली दूध बनाने के लिए यूरिया, कास्टिक सोडा, रिफाईंड तेल, डिटर्जेंट पाऊउर तथा सफेद रंग के पेंट का प्रयोग कर नकली रासायनिक अथवा सिंथेटिक दूध तैयार किया जाता है। ऐसा दूध स्वास्थ्य के लिए बेहद नुकसानदेह होता है। यहां तक कि इस प्रकार के दूध का सेवन करने से कैंसर जैसी बीमारी तक हो सकती है।
दूध में मिलावटखोरी अथवा ज़हरीला दूध बनाए जाने का सिलसिला गत् कई वर्षों से लगभग पूरे देश में जारी है। ऐसा मिलावटी व ज़हरीला दूध न केवल घर-घर सप्लाई किया जा रहा है बल्कि दुकानों, डेयरी, मिल्क प्लांट, चाय की दुकानों व रेस्टोरेंट तथा लगभग पूरे देश में रेलवे स्टेशन के चायखानों में धड़ल्ले से बेचा जा रहा है। और सरकार व इस पर नज़र रखने वाले विभागों के कर्मचारी व अधिकारी हैं कि अपनी आंखें मूंदे बैठे हैं।
गत् वर्ष केंद्र सरकार द्वारा दूध के संबंध में सुप्रीम कोर्ट को अपनी एक सर्वेक्षण रिपोर्ट सौंपी गई थी। इसमें 33 राज्यों से 1791 नमूने इकट्ठे किए गए थे। आश्चर्य का विषय है कि इनमें लगभग 70 प्रतिशत दूध मिलावटी अथवा नकली या रासायनिक पाया गया। इसमें 68 प्रतिशत मिलावटी दूध जहां शहरी क्षेत्रों में खुले दूध के रूप में पाया गया वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में मानक के अनुरूप न पाया जाने वाला नकली दूध 83 प्रतिशत था।
उच्चतम न्यायालय द्वारा केंद्र सरकार को मई 2012 को दिए गए नोटिस के जवाब में केंद्र द्वारा उपरोक्त स्थिति स्पष्ट की गई थी। जिसमें केंद्र सरकार ने साफतौर पर अदालत को यह बता दिया था कि देश में बिकने वाला अधिकांश दूध भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण के द्वारा निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं है।
हालांकि त्यौहारों के समय जब देश में दूध तथा दूध से निर्मित मिठाईयों की मांग ज़ोर पकड़ती है उस समय देश के कोने-कोने से मिलावटी, रासायनिक व ज़हरीले दूध पकड़े जाने की खबरें सुनाई देती हैं। कहीं पूरे का पूरा दूध का टैंकर मिलावटी पाया जाता है और उसे फेंक कर सरकार व अधिकारी अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेते हैं।

जबकि दूध के माध्यम से आम जनता को मौत की आगोश तक पहुंचाने का लालची मिलावटखोर व्यापारियों का यह सिलसिला पूरे वर्ष अनवरत जारी रहता है। और राज्य सरकारें व खाद्य संरक्षा विभाग के अधिकारी यह सबकुछ आंखें मूंदे देखते रहते हैं।
दरअसल हमारे देश में मिलावटखोरी तथा रासायनिक अथवा सिंथेटिक दूध या फिर अन्य मिलावटी या नकली खाद्य सामग्री बेचने या बनाने के विरुद्ध किसी विशेष सज़ा का प्रावधान नहीं है। यह स्थिति भी मिलावटखोर व्यापारियों के हौसले बढ़ाती है।
जबकि हकीकत में यह धंधा सुनियोजित ढंग से तथा लालचवश पैसा कमाने हेतु किया वाला एक ऐसा अपराध है जिससे कि आम आदमी अपनी जान से हाथ भी धो बैठता है। परंतु हमारे देश में इस प्रकार के अपराधी पहले तो पकड़े ही नहीं जाते और यदि पकड़े भी गए तो संबंधित विभाग के अधिकारियों व पुलिस वालों को ‘ले-देकर’ छूट जाते हैं।
और यदि मामला मीडिया के माध्यम से कुछ ज़्यादा ही चर्चा में आ जाए तो भी आरोपी के विरुद्ध ऐसे हल्के-फुल्के आरोप पत्र तैयार कर अदालत में पेश किए जाते है ताकि अपराधियों की जल्द ज़मानत भी हो जाए। और उनके विरुद्ध चलने वाला मुकद्दमा ज़्यादा दिनों तक ज़्यादा मज़बूती से न चल सके।
परिणामस्वरूप साक्ष्य व गवाहों के अभाव में अदालत ऐसे अपराधियों को जल्द ही रिहा कर देती है और ऐसे अपराधी जेल से छूटने के बाद बेखौफ होकर पुन: इसी धंधे को आगे बढ़ाने में लग जाते हैं।
भारत में मिलावटी दूध को रोकने के लिए सख्त कानून बनाए जाने की तत्काल ज़रूरत है। हमारे देश की सरकारों का यह दायित्व है कि जनहित व जनस्वास्थय के मद्देनज़र वह सुनिश्चित करें कि आम लोगों तक पहुंचने वाला दूध शुद्ध, गुणकारी, स्वच्छ व प्राकृतिक है अथवा नहीं। इसके लिए बाकायदा सरकार को दूध संबंधी एक नीति निर्धारित किए जाने की ज़रूरत है। क्योंकि ऐसे दूध का सेवन करने वाले छोटे बच्चे अपनी युवावस्था में पहुंचने तक कैसी-कैसी जानलेवा बीमारियों के शिकार हो सकते हैं। लिहाज़ा समय रहते इस दुर्भाग्यपूर्ण मिलावटखोर व्यवस्था पर सख्त अंकुश लगाने की ज़रूरत है।


