“कुछ लोग प्रगतिशील देशों में अंतरिक्ष क्रियाकलाप की प्रासंगिकता के बारे में प्रश्न चिन्ह लगाते हैं। हमें अपने लक्ष्य पर कोई संशय नहीं है। हम चन्द्र और उपग्रहों के अन्वेषण के क्षेत्र में विकसित देशों से होड़ का सपना नहीं देखते । किंतु राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अर्थपूर्ण भूमिका निभाने के लिए मानव समाज की कठिनाइयों के हल में अति-उन्नत तकनीक के प्रयोग में किसी से पीछे नहीं रहना चाहते।”
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देश के पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने एक बार अपने भाषण में कहा था, ‘मैंने कोई बहुत ऊंचे दर्जे की शिक्षा नहीं ली है लेकिन अपने काम में बहुत मेहनत करता था और यही वजह रही कि प्रोफेसर विक्रम साराभाई ने मुझे पहचाना, मौका दिया और आगे बढ़ाया। जब मेरा आत्मविश्वास सबसे निचले स्तर पर था तब उन्होंने मुझे जिम्मेदारी दी और यह सुनिश्चित किया कि मैं अपने काम में सफल रहूं। यदि मैं असफल होता तब भी मुझे पता था कि वे मेरे साथ हैं।’
उस जमाने में कलाम को ही नहीं, इसरो के पूर्व अध्यक्ष के कस्तूरी रंगन से लेकर वरिष्ठ वैज्ञानिकों की एक ऐसी पीढ़ी साराभाई ने तैयार की थी जो भारतीय वैज्ञानिक जगत की रीढ़ कही जा सकती है।
यह 1950 का दशक था। दुनिया के तमाम शीर्ष देशों में परमाणु अनुसंधान और अंतरिक्ष विज्ञान से संबंधित संस्थानों और परियोजनाओं को प्रोत्साहन दिया जा रहा था। भारत के पास इन दोनों क्षेत्रों का नेतृत्व करने के लिए दो प्रतिभाशाली वैज्ञानिक मौजूद थे जिनमें से एक थे डॉ. विक्रम साराभाई। भारत में आजादी के तुरंत बाद 1948 में परमाणु ऊर्जा आयोग बनाया गया और पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भाभा को इसका पहला अध्यक्ष नियुक्त किया। वे नेहरू के वैज्ञानिक सलाहकार भी थे।

12 अगस्त को गूगल ने डूडल के जरिए डॉ. विक्रम साराभाई का 100 वां जन्मदिन मनाया, जिन्हें भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का जनक माना जाता है। साराभाई ने कहा था, ‘कुछ ऐसे हैं जो एक विकासशील राष्ट्र में अंतरिक्ष गतिविधियों की प्रासंगिकता पर सवाल उठाते हैं। हमारे लिए, उद्देश्य को लेकर कोई अस्पष्टता नहीं है।’
डॉ. विक्रम साराभाई को भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का जनक माना जाता है। उन्होंने भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को दिशा प्रदान की। भारत में उनका सबसे बडा और महत्वपूर्ण योगदान 1969 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसन्धान संस्था (इसरो) की स्थापना में रहा है। इस संस्था का मुख्य उद्देश्य देश में तंत्रज्ञान के उपयोग को बढाना और देश की सेवा करना ही था। उन्होंने भारत जैसे विकासशील देश के लिए रूस स्पुतनिक के सफलतापूर्वक प्रक्षेपण के बाद अंतरिक्ष कार्यक्रम के महत्व पर सरकार को राजी कर लिया।
डॉ. साराभाई अंतरिक्ष कार्यक्रम के महत्व पर यह वक्तव्य बल प्रदान करता है:
“कुछ लोग प्रगतिशील देशों में अंतरिक्ष क्रियाकलाप की प्रासंगिकता के बारे में प्रश्न चिन्ह लगाते हैं। हमें अपने लक्ष्य पर कोई संशय नहीं है। हम चन्द्र और उपग्रहों के अन्वेषण के क्षेत्र में विकसित देशों से होड़ का सपना नहीं देखते । किंतु राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अर्थपूर्ण भूमिका निभाने के लिए मानव समाज की कठिनाइयों के हल में अति-उन्नत तकनीक के प्रयोग में किसी से पीछे नहीं रहना चाहते।”
डॉ. विक्रम साराभाई का जन्म 12 अगस्त, 1919 को गुजरात के अहमदाबाद शहर के एक समृद्ध परिवार में हुआ था। साराभाई का परिवार एक महत्वपूर्ण और सम्पन्न जैन व्यापारी परिवार था। उनके पिता श्री अम्बालाल साराभाई एक प्रसिद्ध व्यवसायी एवं उद्योगपति थे। उनकी माता श्रीमती सरला साराभाई एक शिक्षाविद् थीं, जिनके निर्देशन में घर पर ही निर्मित स्कूल में डॉ। विक्रम की प्रारम्भिक शिक्षा हुई । उस स्कूल में हर विषय के योग्य एवं विद्वान शिक्षकों को बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी ।

इसके अतिरिक्त, उनके घर पर महात्मा गाँधी, सीवी रमन, जवाहरलाल नेहरू, गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर जैसे महापुरुषों का आना-जाना लगा रहता था, जिससे बचपन से ही उन्हें इन महापुरुषों का सान्निध्य मिला, जिसका व्यापक प्रभाव डॉ। साराभाई के व्यक्तित्व पर पड़ा ।
डॉ. साराभाई ने अपना पहला अनुसंधान लेख ”टाइम डिस्ट्रीब्यूशन ऑफ कास्मिक रेज़” भारतीय विज्ञान अकादमी की पत्रिका में प्रकाशित हुआ था। वर्ष 1940-45 की अवधि के दौरान कॉस्मिक रेज़ पर साराभाई के अनुसंधान कार्य में बंगलौर और कश्मीर-हिमालय में उच्च स्तरीय केन्द्र के गेइजर-मूलर गणकों पर कॉस्मिक रेज़ के समय-रूपांतरणों का अध्ययन शामिल था।
द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति पर वे कॉस्मिक रे भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में अपनी डाक्ट्रेट पूरी करने के लिए वापिस से कैम्ब्रिज चले गए। 1947 में उष्णकटीबंधीय अक्षांक्ष (ट्रॉपीकल लैटीच्यूड्स) में कॉस्मिक रे पर अपने शोध कार्य के लिए कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें डाक्ट्ररेट की उपाधि से सम्मानित किया गया। इसके बाद वे भारत लौट आए और यहां आ कर उन्होंने कॉस्मिक रे भौतिक विज्ञान पर अपना अनुसंधान कार्य जारी रखा। भारत में उन्होंने अंतर-भूमंडलीय अंतरिक्ष, सौर-भूमध्यरेखीय संबंध और भू-चुम्बकत्व पर अध्ययन किया। डॉ. विक्रम साराभाई ने 86 वैज्ञानिक शोध पत्र लिखे।

डॉ. विक्रम ने भौतिकी अनुसन्धान प्रयोगशाला (अहमदाबाद), भारतीय प्रबन्धन संस्थान (अहमदाबाद), सामुदायिक विकास केन्द्र (अहमदाबाद), विक्रम साराभाई अन्तरिक्ष केन्द्र (तिरुअनन्तपुरम्) जैसे भारत के प्रसिद्ध संस्थानों की स्थापना में अपनी महत्वपूर्ण एवं अग्रणी भूमिका निभाई ।
इन सबके अतिरिक्त, उद्योगों की महत्ता को देखते हुए उन्होंने देश के विभिन्न भागों में कई उद्योगों की भी स्थापना की, जिनमें साराभाई केमिकल्स, सिम्बायोटिक्स लिमिटेड, साराभाई रिसर्च सेण्टर एवं अहमदाबाद टेक्सटाइल इण्डस्ट्रीज, रिसर्च एसोसिएशन प्रमुख हैं ।
गौरतलब है कि वर्ष 1962 में डॉ. साराभाई को भारत में अन्तरिक्ष अनुसन्धान एवं विकास की जिम्मेदारी सौंपी गई। इस दौरान वे भारतीय विज्ञान काँग्रेस के अध्यक्ष भी रहे। वर्ष 1956 से 1966 के बीच उन्होंने अनेक निजी क्षेत्र की कम्पनियों के भी निदेशक के तौर पर कार्य किया।
वर्ष 1962 से 1965 तक बे इण्डियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेण्ट, अहमदाबाद के निदेशक रहे। रोहिणी एवं मेनका नामक भारतीय रॉकेट श्रृंखला के जनक डॉ। साराभाई ही थे। उन्होंने भारत को अन्तरिक्ष युग में ले जाने में अग्रणी भूमिका निभाई, इसलिए उन्हें ‘भारतीय अन्तरिक्ष कार्यक्रमों का जनक’ कहा जाता है।
विमान दुर्घटना में होमी भाभा के अकालिक मृत्यु के बाद, विक्रम साराभाई ने मई 1966 में परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष पद को संभाला। वे हमेशा से यह चाहते थे कि विज्ञान के प्रायोगिक उपयोग आम आदमी तक पहुंचे। उन्होंने राष्ट्र के वास्तविक संसाधन की तकनीकी तथा आर्थिक मूल्यांकन के आधार पर देश की समस्याओं के लिए उन्नत प्रौद्योगिकी में सक्षमता प्राप्त करने की दिशा में कार्य किया। उन्होंने भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की शुरुआत की, जो आज पूरे विश्व में विख्यात है।
डॉ. विक्रम साराभाई को 1962 में शांति स्वरुप भटनागर पदक से सम्मानित किया गया। इसके कुछ वर्षों बाद राष्ट्र ने वर्ष 1966 में पद्म भूषण तथा वर्ष 1972 में पद्म विभूषण (मरणोपरांत) से सम्मानित किया।
डॉ. साराभाई द्वारा स्थापित जाने माने कुछ संस्थान हैं:
- भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (पीआरएल), अहमदाबाद
- भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम), अहमदाबाद
- कम्यूनिटी साइंस सेंटर, अहमदाबाद
- कला प्रदर्शन के लिए दर्पण अकादमी, अहमदाबाद (अपनी पत्नी के साथ)
- विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र, तिरुवनंतपुरम
- अंतरिक्ष उपयोग केंद्र, अहमदाबाद (साराभाई द्वारा स्थापित छह संस्थानों/ केन्द्रों के विलय के बाद यह संस्था अस्तित्व में आई)
- फास्टर ब्रीडर टेस्ट रिएक्टर (एफबीटीआर), कलपक्कम
- परिवर्ती ऊर्जा साइक्लोट्रॉन परियोजना, कलकत्ता
- भारतीय इलेक्ट्रॉनकी निगम लिमिटेड (ईसीआईएल), हैदराबाद
- भारतीय यूरेनियम निगम लिमिटेड (यूसीआईएल), जादुगुडा, बिहार


