पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले में रहने वाले व पद्मश्री से सम्मानित करीमुल हक ने अब तक करीब चार हजार लोगों की जान बचाई है। उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर अपने इस नेक विचार को जन-जन तक पहुंचाने का बीड़ा उठाया हुआ है।
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उस अदने से इंसान के पास अपना कोई वाहन नहीं था। इस वजह से वह अपनी बीमार मां को समय पर अस्पताल नहीं पहुंचा पाया जिससे उसकी मां की मौत हो गई। ऐसे में उस व्यक्ति ने तय किया कि वह अपना सारा जीवन लोगों की जिंदगी बचाने में लगा देगा और ऐसे किसी को मरने नहीं देगा। फिर क्या था गांव के सड़कों पर दौड़ने लगी जीवन रक्षक बाइक ऐंबुलेंस। अब वह गांव के गरीब लोगों को अपनी बाइक ऐंबुलेंस की मदद से जिला अस्पताल तक पहुंचाते हैं और जरूरत पड़ने पर बीमार लोगों को फर्स्ट एड भी देते हैं।
एम्बुलेंस दादा के नाम से मशहूर करीमुल हक एक ऐसी मिसाल बन गए हैं जो एम्बुलेंस सेवाएं प्रदान करने के साथ-साथ वर्तमान सामाजिक परिदृश्य को सुधारना चाहते हैं, सभी में जागरूकता पैदा करना चाहते हैं। इसके लिए उन्होंने अपने आप को पूरी तरह से समाज सेवा के लिए समर्पित कर दिया है। अपने गांव में “मानव सेवा सदन” की स्थापना उनकी इसी इच्छा शक्ति का सबूत है। हक का एकमात्र इरादा एम्बुलेंस सेवा तक ही सीमित नहीं है, उनके पास लोगों और समाज के उत्थान के लिए बहुत सारे भावी योजनाएं भी हैं जिन्हें हमने उनसे विस्तार से जानने की कोशिश की। पाठकों के लिए प्रस्तुत हैं करीमुल हक के साथ हुई बातचीत के कुछ अंश:

आप पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित हैं। आपके कार्य को सभी ने स्वीकार किया है। अब आप खुद को कहां पाते हैं और भविष्य में स्वयं को कहां देखना चाहेंगे?
मुझे पता ही नहीं था कि पद्मश्री पुरस्कार क्या होता है या किसी को इस पुरस्कार से सम्मानित किया जाना कितने सम्मान की बात है। इसलिए कोई ख़ास अनुभूति नहीं होती है, मैं अभी भी वैसा ही हूं जैसा पहले था। लेकिन इतना तो सच है कि इस पुरस्कार ने मेरे काम को एक व्यापक स्तर प्रदान किया और इस क्षेत्र में बड़े स्तर पर कार्य करने के लिए मुझे प्रोत्साहित किया है। इस पुरस्कार ने मुझे अपने गांव में एक अस्पताल बनाने और कुछ किलोमीटर की दूरी पर मौजूद एक उप-विभागीय अस्पताल में बुनियादी सुविधाओं में सुधार करवाने की ताकत दी है। इसकी वजह से ही सरकार का भी इस ओर ध्यान गया है, उसने हमारी बात को गंभीरता से लिए है। उम्मीद तो जगी है, अब देश के कुछ प्रसिद्ध निजी अस्पताल और नर्सिंग होम आगे आए हैं।
अब, मैं गंभीर रूप से बीमार रोगियों को बेहतर उपचार के लिए इन अस्पतालों तक पहुंचने में मदद करने में ज्यादा सक्षम हूं। मैं इन रोगियों के इलाज में होने वाले खर्चों को भी ध्यान में रखता हूं, इसलिए मैंने अपने घर में एक डिजिटल प्रयोगशाला बनाई है। इससे न केवल मेरे क्षेत्र के लोग बल्कि आसपास के गांवों वाले भी इससे काफी लाभान्वित होते हैं। इस डिजिटल परीक्षण सुविधा का लाभ उठाने के लिए लगभग पांच से सात गांवों के लोग हर रोज हमारे यहां आते हैं। हमारे गांव में महीने में दो बार स्वास्थ्य शिविर आयोजित किए जाते हैं। हमारे मानव सेवा सदन का मूल उद्देश्य उन 20 सुदूर गांवों तक अपनी सेवाएं प्रदान करना है जहां मूल स्वास्थ्य सुविधायें उपलब्ध नहीं हैं।
पद्मश्री पुरस्कार प्राप्त होने के बाद क्या आपको लगता है कि समाज के विकास के लिए आपको अधिक जिम्मेदारी लेनी चाहिए?
मेरे द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवा को और व्यापक बनाने की जरूरत है, मुझे लगता है इसे सिर्फ एक गांव या किसी एक क्षेत्र तक ही सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि देश के अन्य हिस्सों में भी पहुंचे। दूरदराज के कई गांवों में अभी भी सड़कें नहीं हैं। गंभीर रोगियों की सेवा के लिए मेरे परिवार के सदस्य भी इसमें शामिल हैं और उन्होंने खुद को इस कार्य के प्रति समर्पित करने का फैसला किया है। पद्मश्री पुरस्कार मिलने के बाद समय के साथ लोगों की हमसे उम्मीदें बढ़ती जा रही हैं। लोगों की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए एक समग्र जागरूकता और सामाजिक विकास होना जरूरी है इसी कारण मैंने अपने परिवार के सदस्यों को इस अभियान में शामिल करने की कोशिश की है।

समाज के विकास के लिए सभी पक्षों में आपने किस पर सबसे अधिक बल दिया है?
किसी अस्पताल को बनाने के लिए फंड की जरूरत होती है। बेहतर और सुसज्जित सुविधाओं से युक्त अस्पताल को बनाने में लगभग 40 लाख की एकमुश्त राशि की आवश्यकता होती है। पद्मश्री पुरस्कार मिलने के बाद मैंने मरीजों के परिवार द्वारा मिली सहयोग राशि से अस्पताल निर्माण के प्रारंभिक कार्य को शुरू किया। अस्पताल में ‘डायग्नोसिस’ सुविधा भी है। समाज में व्यापक स्तर पर विकास के लिए अस्पताल बनाना मेरा उद्देश्य है। मेरे लिए आराम हराम है। इसके अलावा हमने अपने क्षेत्र में आठ प्राथमिक विद्यालय भी बनाए हैं जो बच्चों को बुनियादी शिक्षा प्रदान करते हैं। बच्चे हमारे देश का भविष्य हैं, यदि कोई उन्हें उचित शिक्षा दे सके, तो बड़े स्तर पर विकास संभव है। दूरदराज के गांवों में जहां माता और पिता दोनों ही काम करते हैं वहां के ज्यादातर बच्चे उपेक्षित हैं। मेरा मानना है कि इन बच्चों को उनके बेहतर भविष्य के लिए शिक्षित किया जाना चाहिए। इन बच्चों को पढ़ाने के लिए मैं गांवों की महिलाओं को अपने साथ जोड़ता हूं। ईमानदारी से कहूं तो इस पद्मश्री ने लोगों की सेवा करने के अनेकों रास्ते खोल दिए हैं।
अपनी सेवा से समाज के भविष्य को आकार देने के लिए आपके मुताबिक कौन से अन्य उपाय हो सकते हैं?
इसे केवल एक विचार मत बनने दो, मुझे लगता है कि यह समाज की जरूरत है। मेरे गांव धोलाबारी और आसपास के 20 गांवों में पीने के पानी की बहुत कमी थी। इसके समाधान के लिए अमेरिका के एक बंगाली वैज्ञानिक ने हमें अपना सहयोग दिया। अब धोलाबारी और बारघोरिया के वन क्षेत्रों में लोगों को बहुतायत मात्रा में पानी की आपूर्ति हो रही है। इनमें से अब हर गांव को 20 हजार लीटर पानी मिल रहा है। यह केवल उस अमेरिकी वैज्ञानिक की मदद से ही संभव हो पाया है। यहां तक कि हमने समाज के असहाय बुजुर्गों के लिए ओल्ड एज होम बनाने की पहल भी की है। सरकारी सहायता पर आश्रित रहने या प्रतीक्षा करने के बजाय हमने पहले से ही अपने शुभचिंतकों और कई अन्य एनजीओ का सहयोग लेना ज्यादा मुनासिब समझा। अब तो समाज का एक समग्र विकास ही मेरा एकमात्र उद्देश्य है।


