किस्सागोई: अधपचे कॉफी के बींस को बाली के लोग ढूंढते हैं…साफ करते हैं…परंपरागत तरीके से चूल्हों पर भूनते-पीसते हैं और तैयार करते हैं दुनिया की सबसे मंहगी कॉफी लुवाक।
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बाली यात्रा में पहले ही दिन गो-गजा मंदिर में गणपति देवता और त्रिदेव के दर्शन के बाद हमारे कार ड्राइवर हमें कॉफी के बागान ले गए। मैं कॉफी से जितना दूर भागती हूं राजीव जी को उतनी ही पसंद है। उनका कॉफी का शौक जगजाहिर है तो राइस फील्ड के झूलों से पहले हम कॉफी बागान में गए।
राजीव जी ने धीरे से कान में बताया चौंकना मत…चिढ़ना-चिल्लाना भी मत…हम दुनिया की सबसे महंगी कॉफी लुवाक टेस्ट करने जा रहे हैं….मैंने मासूमियत से कह दिया…हाँ तो, कोई नॉनवेज थोड़े ही है जो दूर भागूंगी। आप भी…हाँ कॉफी पसंद नहीं है लेकिन भारतीय दूध-शक्कर-अदरक की चाय के बिना दूसरे देशों की ब्रेकफास्ट टी तो सख्त नापसंद है….चाय की जगह यहां कॉफी चलेगी।

फोटो स्रोत: श्रुति अग्रवाल
अब यहां के कॉफी बागान के बाहर भी गणेशी बेटा की प्रतिमा मिल गई। अंदर कॉफी बागान की गाइड हमें बगीचे के टूर पर ले गई। यहां कॉफी के पेड़ दिखाते समय उन्होंने पिंजरे में बंद बिल्ली जैसे जानवर से मिलवाया…ये महाराज थे सिवेट…बिल्ली-लोमड़ी के बीच सा कुछ लगा। उसके बाद जो पता चला लगा, कॉफी से जिंदगी भर की दुश्मनी कर ली जाए तो ही अच्छा।

फोटो स्रोत: श्रुति अग्रवाल
ये सिवेट महाशय कॉफी के लाल-लाल फल खाते हैं लेकिन पूरा पचा नहीं पाते…कुछ वैसे ही जैसे हम लोग बचपन में बोर (छोटे बेर) जल्दी में खाने के चक्कर में निगल जाया करते थे और फिर वो लाल-महरून फल पॉटी में देख मम्मी…खून निकला चिल्लाते थे लेकिन यहां बचपना नहीं बड़प्पन का काम था। तो सीवेट महाशय के पेट में जो रसायनिक-भौतिक क्रियाएं होती होंगी उससे कॉफी का स्वाद महान हो जाता है।
इन अधपचे कॉफी के बींस को बाली के लोग ढूंढते हैं…साफ करते हैं… परंपरागत तरीके से चूल्हें पर भूनते-पीसते हैं और तैयार करते हैं दुनिया की सबसे मंहगी कॉफी लुवाक…इंट्रस्टिंग…मन कह रहा था जिंदगी में अब कभी कॉफी पीनी ही नहीं…इस बेचारे सिवेट को जेल से निकाला जाए औऱ रफूचक्कर हुआ जाए लेकिन राजीव जी साथ हो तो यह संभव नहीं।

फोटो स्रोत: श्रुति अग्रवाल
अल्कोहल से राजीव जी का याराना न के बराबर है। जब पता चला कि न्यूजीलैंड की सबसे महंगी वाइन सॉविनन ब्लैंक (Sauvignon Blanc) में बिल्ली की सूसू मिलाते हैं या इसका अरोमा ऐसा होता है…भगवान जाने…उसकी गहरे रंग की बॉटल भी एक बार मेरे घर की दहलीज चढ़ा चुके थे। अब ये दूसरा कौतुक था…सूसू के बाद पॉटी…हद ही है।
हमारी गाइड ने हमें बगीचे का छोटा-सा टूर करा दिया। उसके बाद वो छोटे-छोटे ग्लॉस से सजी बेहद खूबसूरत ट्रे लाई, जिसमें भांति-भांति की कॉफी हर्बल टी, स्पाइज्ड चॉकलेट पॉवडर थे। उसने कहा ये सारी टेस्टिंग फ्री है…यदि लुवाक पीना है तो हमें दाम चुकाने होंगें। मेरे चेहरे की स्माइल बड़ी हो गई, मेरे कंजूस डॉक्टर…बच गए यहां लेकिन राजीव जी कहां बदलने वाले थे। उन्होंने कॉफी के कप का दाम चुकाना मुझसे भी बड़ी मुस्कुराहट के साथ मंजूर कर लिया।
हमारे सामने बड़े ही शाहाना अंदाज से सिवेट की पॉटी से कॉफी बनाई गई। सच कह रही हूं, अरोमा बेहद अच्छा था। राजीव जी उसके अरोमा का किसी अच्छी वाइन की तरह लुत्फ ले रहे थे, मैं आस-पास से खिसकने का सोच रही थी। आखिर में घुट्टी की तरह एक चम्मच लुवाक चखी। मुझे कोई अंतर समझ ना आया…जैसे वाइन के मामले में अनाड़ी हूं वैसे ही कॉफी के। हाँ इतना जरुर है…अजब-गजब सी कॉफी है… सॉविनन ब्लैंक की तरह इस कॉफी का एक पैकेट भी मेरे घर की दहलीज चढ़ चुका है।
हालांकि वहां जाकर अपनी हल्दी की चाय बनाना जरुर सीख लिया। बाकी सब…मेरे जैसे इंसान के लिए। यदि आप में राजीव जी की तरह हिम्मत हो तो बाली यात्रा के समय लुवाक जरूर ट्राय करें। गाइड जब मुझे सीवेट से मिलवा रही थी…मुझे सीवेज याद आ गया..गुस्ताखी माफ। डॉक्टर साहब कह रहे थे, बड़ी शाकहारी बनती हो न…जाओ सब्जियाँ जहां लगती हैं वहां घूम आओ।


