विश्व आदिवासी दिवस पर विशेष – देश के एक बड़े समुदाय के साथ ‘ऐतिहासिक अन्याय’ हुआ है। इस कानून के माध्यम से उसे दुरुस्त करने का प्रयास कई सरकारों ने किया लेकिन आज भी इन कानून का लाभ पूरे समुदाय को नहीं मिल पाया है।
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एक दशक पहले 1 जनवरी 2008 को कांग्रेस की अगुवाई वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार ने देश में अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 को लागू किया था।
इसे बोलचाल की भाषा में वन अधिकार कानून कहा जाता है। अधिनियम की प्रस्तावना में कहा गया है कि ‘आदिवासियों एवं जंगलवासियों के साथ हुए ‘‘ऐतिहासिक अन्याय’’ से उन्हें मुक्ति दिलाने और जंगल पर उनके अधिकारों को मान्यता देने के लिए यह कानून है ‘। कानून के अनुसार 13 दिसंबर 2005 से पहले वन भूमि पर काबिज आदिवासियों को और तीन पीढ़ियों से रह रहे अन्य वन निवासियों को उस भूमि पर अधिकार का पट्टा देने की बात की गई है।
आदिवासियों के साथ ऐतिहासिक अन्याय का मसला सिर्फ भारत में ही नहीं है, बल्कि दुनिया भर में है। अलग-अलग देशों में रह रहे वहां के स्थानीय मूल निवासियों को अपने अधिकारों और सम्मान एवं अधिकार के लिए आज भीसंघर्ष करना पड़रहा हैं।
भारत सहित अधिकांश देशों में आदिवासियों का जीवन प्राकृतिक संसाधनों पर टिका हुआ है। उनका आर्थिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक जीवन प्रकृति के बिना अधूरा है। दूसरी ओर पिछले कुछ दशकों में विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों का तेजी से दोहन शुरू हो गया, जिसकी सबसे ज्यादा मार आदिवासी समुदायों पर ही पड़ी है। ऐसे में यह जरूरी था कि दुनिया के इन आदिम समुदायों को संरक्षण दिया जाए और उनके सम्मान के लिए अन्य लोगों को जागरूक किया जाए।
इसी परिप्रेक्ष्य में इन समुदायों की जरूरतों एवं संस्कृति के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए 9 अगस्त को अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी दिवस मनाने का निर्णय 1982 में जिनेवा में आयोजित स्वदेशी आबादी पर संयुक्त राष्ट्र कार्य समूह की पहली बैठक में लिया गया था, तब से हर साल दुनिया में 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस मनाया जाता है।
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार दुनिया में लगभग 37 करोड़ की आबादी स्वदेशी लोगों यानी आदिवासियों की है, जो 90 देशों में रहते हैं। वे दुनिया की कुल आबादी के 5 फीसदी हैं, लेकिन पूरी दुनिया की गरीबी में उनकी जनसंख्या 15 फीसदी है। वे दुनिया की लगभग 7,000 भाषाओं को बोलते हैं और 5,000 विभिन्न संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। आदिवासी अपनी पहचान, अपने जीवन के तरीके और पारंपरिक भूमि, क्षेत्र और प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार के लिए वर्षों से मान्यता मांग रहे हैं, फिर भी पूरे इतिहास में उनके अधिकारों का हमेशा उल्लंघन हुआ है। आज आदिवासी लोग दुनिया के सबसे वंचित और कमजोर लोगों में हैं।
भारत दुनिया के उन देशों में है, जहां विभिन्न आदिवासी समुदायों के हितों की रक्षा के लिए संवैधानिक प्रावधान भी किए गए हैं। भारत में मध्यप्रदेश वह राज्य है, जहां आदिवासियों की जनसंख्या अन्य राज्यों की तुलना में सबसे ज्यादा है।
जनगणना 2011 के अनुसार भारत में 8.6 फीसदी आबादी (लगभग 11 करोड़ लोग) आदिवासियों की है। देश के कुल आदिवासियों में 153.16 लाख यानी 14.7 फीसदी आदिवासी मध्यप्रदेश में रहते हैं, जो मध्यप्रदेश की कुल जनसंख्या में 21.10 फीसदी हैं। जनगणना एवं अन्य रिपोर्ट्स को देखा जाए, तो इन आदिवासी परिवारों एवं जंगलों पर आश्रित परिवारों की आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति बहुत ही कमजोर है और विभिन्न विकास परियोजनाओं के नाम पर इन्हें लगातार विस्थापित किया जाता रहा है।
पूरी दुनिया में आदिवासी समुदाय विस्थापन, बेहतर पुनर्वास, स्थानीय संसाधनों, खासतौर पर वनों एवं नदी पर अधिकार जैसे मुद्दों से जूझ रहा है। मध्यप्रदेश भी इससे अछूता नहीं है। बड़े बांधों के कारण विस्थापन हो या फिर संरक्षित वन क्षेत्रों से विस्थापन, इसका सबसे ज्यादा खामियाजा इन समुदायों ने ही भुगता है। ऐसे में यह जरूरी है कि विश्व आदिवासी दिवस के बहाने इन समुदायों की समस्याओं का समाधान किया जाए।
मध्य प्रदेश में आदिवासी परिवारों की संख्या ज्यादा होने की वजह से स्वाभाविक था कि यहां वन अधिकार कानून के तहत अधिकतम आदिवासियों को पट्टे मिल जाते, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। पूरे देश के कुल आवेदनों में सबसे ज्यादा मध्य प्रदेश में ही खारिज हुए हैं। फरवरी में जब सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में 21 राज्यों को आदेश दिया कि वे अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पारंपरिक वनवासियों को जंगल से बेदखल कर वन भूमि को खाली करवाएं, तो पूरे देश में हड़कंप मच गया था। बाद में अपने फैसले का रिव्यू करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस पर अगले आदेश तक रोक लगा दी।
आदिवासी मामलों के मंत्रालय के अनुसार 45 फीसदी से भी कम व्यक्तिगत दावे और 50 फीसदी से भी कम सामुदायिक दावे मान्य किए गए हैं। मंत्रालय ने यह इंगित किया है कि वन अमले के बेतुके आपत्ति के कारण दावे निरस्त हुए हैं।
सबसे ज्यादा मध्यप्रदेश में 3,54,787 दावे खारिज होने का हलफनामा मध्य प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किया था। इनमें से आदिवासियों के 2,04,123 दावे और अन्य के 1,50,664 दावे खारिज कर दिए गए हैं। इस कानून को लागू करने की जिम्मेदारी आदिम जाति कल्याण विभाग को दी गई है और जिस भूमि पर अधिकार लेना है वह वन विभाग का है। इस पूरी प्रक्रिया में अधिकारियों की उदासीनता एवं वन विभाग के नकारात्मक रवैये के कारण सभी आदिवासी न तो सही तरीके से दावे कर पाए और न ही समुचित कागजात लगा पाए।
हाल ही में मध्य प्रदेश सरकार ने वन अधिकार अधिनियम के तहत पट्टों के लिए प्राप्त आवेदनों में से अमान्य आवेदनों पर पुनर्विचार किए जाने का निर्णय लिया है। यह निर्णय आदिवासियों के हित में है, लेकिन इसके लिए जरूरी है कि सरकारी अमले का रवैया सकारात्मक हो, हर भूमिहीन, बेघर एवं वनों पर आश्रित आदिवासियों को पट्टा दिया जाए। मध्य प्रदेश सरकार ने एक और महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए आदिवासियों के देवस्थान एवं आस्था स्थलों के संरक्षण, विकास एवं विस्तार के लिए नई ‘स्थान’ योजना की स्वीकृति दी है।
यह बहुत ही महत्वपूर्ण है। इसे अलग से भी देखा जा सकता है और वन अधिकार कानून में वर्णित सामुदायिक अधिकार एवं हैबिटेट अधिकार के साथ जोड़कर देखा जा सकता है। यदि किसी आदिवासी परिवार को रहने के लिए वन में पट्टा मिल जाए और उसे वहां आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए अधिकार न हों, तो न्याय अधूरा रह जाएगा।
वैश्विक स्तर पर पूरे विश्व में आदिवासी दिवस के लिए यह साल आदिवासी समुदायों की भाषा को समर्पित है। यह बहुत ही महत्वपूर्ण मसला है। आदिवासियों को मुख्यधारा से जोड़ने की प्रक्रिया में उनकी भाषाओं पर ध्यान नहीं दिया गया और कई भाषाएं अपने अस्तित्व से जूझ रही हैं।
यूनेस्को की रिपोर्ट को देखें, तो पता चलता है कि अधिकांश भाषाएं जो विलुप्त हो गई हैं या विलुप्त होने की कगार पर हैं, वे सभी किसी न किसी आदिवासी समुदाय की थीं। इन भाषाओं का संरक्षण एक सभ्यता के संरक्षण की तरह है। अभी हाल ही में मध्यप्रदेश में गोंडी भाषा को प्राथमिक शिक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। यह एक सराहनीय पहल है, लेकिन इसे विस्तार देते हुए अन्य आदिवासी भाषाओं तक ले जाना चाहिए। शिक्षाविदों का भी मानना है कि स्थानीय भाषा एवं बोली में प्राथमिक शिक्षा ज्यादा असरकारी होता है।
मध्य प्रदेश ने निर्णय लिया है कि अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी दिवस मनाने के लिए 9 अगस्त को प्रदेश में शासकीय अवकाश रहेगा।अब यह जरूरी है कि आदिवासियों की उनकी समस्याओं का निराकरण करते हुए विकास की ऐसी नीति बनें, जिसमें उन्हें विस्थापित होने से बचाया जा सके। जंगलों से उन्हें बाहर कर प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के नजरिए में बदलाव लाना होगा। प्रकृति के साथ उनके सह अस्तित्व से ही पर्यावरण बचेगा, क्योंकि आदिवासी समुदाय प्रकृति से उतना ही लेता है, जितना उसे जीवन के लिए जरूरी होता है।


