स्तनपान एक प्राकृतिक गर्भनिरोधक है। स्तनपान सुविधाजनक, मुफ्त और माँ तथा शिशु के बीच भावनात्मक संबंध मजबूत करने का सुलभ साधन है। माँ के साथ शारीरिक रुप से जुड़े होने का एहसास शिशुओं को सुख देता है। शिशु जन्म को फौरन बाद स्तनपान शुरु कर देना चाहिए।
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विश्व स्तनपान स्पताह हर साल अगस्त के पहले सप्ताह में मनाया जाता है। इसका उद्देश्य महिलाओं को स्तनपान एवं कार्य को दृढ़तापूर्वक एकसाथ करने का समर्थन देना है, साथ ही कामकाजी महिलाओं को उनके स्तनपान संबंधी अधिकार के प्रति जागरूकता प्रदान करना हैं। शिशु का जन्म होते ही माँ का सुखद स्पर्श जरूरी होता है। पहले स्पर्श में जिस गर्मी की आवश्यकता होती है वह माँ के आँचल से ही मिलती है।
स्पर्श की तपिश का अहसास बचपन में ही होता है। माँ की गर्मी के साथ शिशु एक जुड़ाव महसूस करता है, स्वयं को सुरक्षित महसूस करता है। शिशु को साफ और मुलायम कपड़ो में लपेट कर जितनी जल्दी से माँ को सौंप देना चाहिये। प्रसव के आधे घंटे के अंदर स्तनपान करवाना चाहिये। ऑपरेशन के द्वारा हुए बच्चों के लिये एक घंटा बाद स्तनपान करवाना उचित रहता है। स्तनपान की बात आते ही एक बात याद आती है। गाय का दूध बछड़े के लिये है तुम्हारे बच्चे को तुम्हारे दूध की जरुरत है। माँ के दूध पर आधारित सभी कहावतों के पीछे एक ठोस आधार है।
हर माँ का दूध उसके शिशु के लिये एकदम उपयुक्त होता है। शिशु 28 हफ्ते में ही जन्म ले तो उसकी पाचन शक्ति और जरुरत के हिसाब से प्रोटीन्स, विटामिन्स और चर्बी माँ के दूध में होती है। जैसे उस शिशु की जरुरत के अनुसार खास तौर पर तैयार किया गया हो। माँ का दूध मतलब माँ के आँचल से मिलने वाली खुराक-सदा ताजी, साफ-सुथरी, झंझट से दूर, हमेशा माँ के पास, सभी पौष्टिक तत्वों सहित सही मात्रा में प्रोटीन, विटामिन्स, ग्लूकोस, वसा और साथ ही रोग प्रतिकारक क्षमता। माँ से गहन जुड़ाव। स्तनपान के फायदें इतने हैं कि व्याख्या करना कठिन है।
स्तनपान के क्षेत्र में भी फैशन ने बाजी मार ली है। आधुनिक फैशन, ट्रैन्ड, फिगर और कठिनाई जैसे बहानों का इस्तेमाल कर शिशु को इससे वंचित रखना दुखद है। नवजात शिशु को देखना माँ के लिए एक सुंदर अनुभव रहा है। माँ के पास गर्म , मुलायम कपड़ों में लिपटा शिशु बगल में लेटते ही माँ को तलाशना शुरु करता देता है। होठों पर जीभ फेरकर दूध की माँग करता है।
स्तनपान शुरु करने का यही सही समय है। कहते हैं शिशु के लिये स्तनपान सीखी हुई बात है। लेकिन पहली बार बनी माँ के लिये यह एकदम नया अनुभव है। माँ को सहजता से इसकी शुरुआत करनी चाहिये। माँ की विकलता शिशु तुरंत भाँप लेता है…इसीलिये परेशान माँ का शिशु भी अक्सर चिढ़ जाता है। अगर सही तरीके से स्तनपान की शुरुआत की जाये तो माँ और शिशु के बीच के रिश्ते को अच्छी और तनाव रहित शुरुआत हो सकती है।
शिशु को पहले छह महीने तक केवल स्तनपान पर ही निर्भर रखना चाहिए। यह शिशु के जीवन के लिए जरुरी है, क्योंकि मां का दूध सुपाच्य होता है। इससे पेट की गड़बड़ियों की आशंका नहीं होती। मां का दूध शिशु की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में भी सहायक होता है।
स्तनपान से दमा और कान की बीमारी पर नियंत्रण रहता है। माँ का दूध शिशु की नाक और गले में प्रतिरोधी त्वचा बना देता है। इसके विपरीत माँ का दूध शत-प्रतिशत सुरक्षित है। इस विषय पर किए गए शोध से प्रमाणित हुआ है कि स्तनपान करने वाले बच्चे बाद में मोटे नहीं होते। उन्हें शुरु से ही जरुरत से अधिक खाने की आदत नहीं पड़ती।
स्तनपान से जीवन के बाद के चरणों में रक्त कैंसर, मधुमेह और उच्च रक्तचाप का खतरा कम हो जाता है। स्तनपान से शिशु की बौद्धिक क्षमता भी बढ़ती है। स्तनपान करानेवाली मां और उसके शिशु के बीच भावनात्मक रिश्ता होता है। इसके अलावा माँ के दूध में कई प्रकार के प्राकृतिक रसायन भी मौजूद होते हैं।
नयी माताओं द्वारा स्तनपान कराने से उन्हें गर्भावस्था के बाद होनेवाली शिकायतों से मुक्ति मिल जाती है। इससे तनाव कम होता है और प्रसव के बाद होनेवाले रक्तस्राव पर नियंत्रण हो जाता है। स्तनपान करानेवाली माताओं को स्तन या गर्भाशय के कैंसर का खतरा नहीं होता।
स्तनपान एक प्राकृतिक गर्भनिरोधक है। स्तनपान सुविधाजनक, मुफ्त और माँ तथा शिशु के बीच भावनात्मक संबंध मजबूत करने का सुलभ साधन है। माँ के साथ शारीरिक रुप से जुड़े होने का एहसास शिशुओं को सुख देता है। शिशु जन्म को फौरन बाद स्तनपान शुरु कर देना चाहिए। शिशु पहले 30 से 60 मिनट के दौरान सर्वाधिक सप्रिय रहता है।


