देश के युवाओं के सामने ये परीक्षा की घड़ी है कि वे नेताओं के साम्प्रदायिक जाल में फंसकर धर्म और जातिवाद पर बात करते हैं। आज समय बदलाव चाहता है कि इन सबसे ऊपर उठकर देश के वास्तविक मुद्दे जैसे प्रदूषण, ग़रीबी, अशिक्षा, महिला सुरक्षा, बेरोज़गारी जैसे गम्भीर मुद्दों पर बात की जाये।
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हमारे देश में राजनीति की दिशा और दशा दोनों बदल रही है। देशहित की भावना को संकुचित करते हुए राजनीति में परिवारवाद,जातिवाद और कौमवाद ने अपनी जड़ें गहरी जमा ली हैं। आये दिन जिस तरह से नेताओं के भ्रष्टाचार के किस्से बाहर आ रहे हैं देश के युवा वर्ग में राजनीती के प्रति उदासीनता बढ़ती जा रही है।
विशेषकर तब जब देश के स्थापित नेता, मंत्री, मुख्यमंत्री तथा प्रधानमंत्री द्वारा अनैतिक व असंवैधानिक ही नहीं बल्कि अवैज्ञानिक टिप्पणी की जाती है तो उन युवाओं की राजनीति में कमी खलती है जो नैतिक, संवैधानिक व वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ-साथ शिक्षित भी हैं और समझदार भी।
इसका एक कारण यह है कि भारत में राजनीती का माहौल दिन प्रतिदिन दिन बिगड़ रहा है और सच्चे राजनीती लोगों की जगह सत्ता लालसा और धन के लालची लोगों ने ले ली है। ऐसे हालातों में देश के युवाओं को ही खुद देश के लिए कुछ कर गुजरने के पाठ पढ़ने होंगे।
दरअसल आज समाज में राजनीति अछूत होती जा रही है। तकरीबन आज हर घर में बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर, प्रशासनिक अधिकारी बनाने के सपने देखे जाते हैं। कोई भी अभिभावक या परिवार कभी अपने बच्चे को यह नहीं कहता कि मेहनत से पढ़ो, तुम्हें राजनीति करना है। इस बात को नकारते हुए कि भारत आज युवा शक्ति के मामले में दुनिया में सबसे अधिक समृद्ध है। जबकि यही स्थिति भारत को विकास के लिहाज से महत्वपूर्ण दिशा दे सकती है। यह संभव तभी हो पाएगा, जब देश, समाज, राजनीतिक दल युवाओं को प्राथमिकता देंगे। युवाओं को शुरू से ही मौका देंगे और वहीं दूसरी ओर युवा विकास एजेंडा तय करने के लिए अपने आपको देश और राजनीति को समर्पित करेगा।
सवाल यह है क्यों ज़रूरी है युवाओं का राजनीति में आना? ऐसे पढ़े लिखे युवाओं का राजनीति में आना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि वर्तमान राजनीति को हास्य-व्यंग के मकड़जाल से निकालकर देश के वास्तविक मुद्दों पर लाना और उसे नया आयाम देना देश की सबसे बड़ी ज़रूरत है।
जब देश के किसी राज्य का मुख्यमंत्री किसी विचारधारा को थोपने की जल्दबाज़ी में अतीत काल की उपलब्धियों को देश की युवा पीढ़ी के सामने अवैज्ञानिक तरीके से परोसे तो वैसी स्थिति में सूझ-बूझ वाले युवा आगे आएं, और देशहित के लिए सक्रिय राजनीति में हिस्सा लेकर ऐसे ज्ञानियों को उनकी औकात बता दें।
जब देश के राजनेता किसी काल्पनिक राष्ट्र को गढ़ने की बात करें, लोगों को अराजक बनाने का काम करें तो इन हालातों में देश के समझदार युवाओं को राजनीति में आकर प्रेम, सौहार्द और सहिष्णुता का प्रतीक बनकर शांति का संदेश देना चाहिए। दरअसल देश को किसी और काल्पनिक राष्ट्र की कोई आवश्यकता नहीं है।
क्या वर्तमान राजनेता अपने भाषणों की अमर्यादित भाषा से देश की युवा पीढ़ी को गंदी राजनीतिक विरासत नहीं दे रहे हैं? क्या देश के नेता एक दूसरे को चोर और नीच कह कर भाषा का स्तर नीचे नहीं गिरा दिए हैं? आप ही बताइए, जिनकी भाषा का स्तर गिरा हुआ हो वो देश का स्तर ऊपर कैसे ला सकते हैं? प्रदूषण के कारण बड़े शहरों में बच्चे ज़हरीली हवा में सांस ले रहे हैं, क्या ये मुद्दा नहीं है? महिलायें और बच्चियां सुरक्षित नहीं हैं, उनका यौन शोषण किया जा रहा है, क्या ये मुद्दा नहीं है?
जागो मोहन प्यारे! इन मुद्दों पर बात करने के लिए मोहन को जागना ही होगा, युवाओं को राजनीति के अग्निकुंड में उतरना ही होगा। देश को एक नई राजनीतिक दिशा देकर देश की दशा को बदलना होगा। युवा ही इसकी दिशा बदल सकते हैं। अच्छी पढ़ाई और ज्ञानवान यूथ को इसके प्रति सोचना होगा। सत्ता का मोह छोड़कर जनता और समाज के हितों के बारे में सोचना होगा। इसके बाद समाज में बदलाव निश्चत होना तय है।


