फॉरेस्ट मैन ऑफ इंडिया के रूप में प्रसिद्ध हो चुके जादव पायेंग का यह सफर आज भी बदस्तूर जारी है। वन्य प्राणियों और वनस्पतियों के प्रति इस वन-पुरुष के असीम प्यार की एक बेमिसाल कहानी जानने के लिए हमने बात के जादव पायेंग से, प्रस्तुत हैं उस बातचीत के कुछ अंश:
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$cat_ID is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 378
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$category_count is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 379
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$category_description is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 380
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$cat_name is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 381
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$category_nicename is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 382
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$category_parent is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 383
आपकी कहानी बेमिसाल है। आपकी लगन, ज़िद और मेहनत ने हज़ारों दुश्वारियों को पार कर यहां तक पहुंचाया है। कैसा लगता है आज इस मुकाम पर पहुंच कर?
– जो कुछ मैंने किया और जो कर रहा हूं, उसे सफलता-असफलता के नज़रिये से कभी नहीं देखा। मैंने इसे अपना कर्तव्य माना, पौधे लगाना और उनकी परवरिश करना। मैं तो बस अपना काम करता रहा। जाहिर है, उन पौधों को बढ़ते और जंगल में तब्दील होते देखना अच्छा लगता है। एक सुकून मिलता है, लेकिन अभी भी बहुत काम बाकी है। असम के साथ-साथ भारत के अन्य राज्यों और पूरी दुनिया में अभी यह काम बाकी है। मेरा मानना है कि जब तक पूरी दुनिया हरियाली की चादर न ओढ़ ले, तब तक मेरा काम अधूरा है। यह हम सभी का दायित्व है- प्रकृति का ख्याल रखना। हम सब इसी प्रकृति का हिस्सा हैं। मेरा मानना है कि अगर दुनिया का हर इंसान अपना दायित्व निभाये, तो हर जगह धरती हरी-भरी होगी और उस पर पलने वाली ज़िंदगी भी।
आखिर कब और कैसे आप इस सफर पर निकले?
– मैं इसी जगह पैदा हुआ था। यह क्षेत्र वन्य प्राणियों और कई तरह के पेड़-पौघों के लिए प्रसिद्ध था। यहां हर किस्म के फल मिलते थे। उन दिनों कोलकाता से जहाज भी आया करते थे, रेलवे स्टेशन भी था। लेकिन 1965 में भयंकर बाढ़ आयी और 10 किमी का इलाका पूरी तरह नदी में बह गया। रेलवे स्टेशन और जहाज घर भी नहीं रहा। कई दूसरे परिवारों की तरह हमारा परिवार भी माजुली में जाकरबस गया और मैं अपनी पढ़ाई के लिए बालीगांव चला गया। मैंने 10वीं पास की है। उन दिनों मिशिंग जनजाति के लोगों का पेशा गाय, भैंस और सुअर पालना था, जो आज भी कइयों की आजीविका का जरिया है। कुछ अरसे बाद जब मैं अपनी गायों और भैंसों को चराने के क्रम में अपने जन्मस्थान गया, तो वह इलाका नदी का बनाया हुआ एक रेगिस्तान-सा नज़र आया। 1979 में एक और बाढ़ आयी। जून-जुलाई की इस बाढ़Þ के बाद जब पानी सूखा, तो रेत की गर्मी की वजह से कई सांप मरे पाये गये। जानवरों को तड़पता, मरता हुआ देख कर मैं दुखी और बेचैन हो गया। सोचने लगा कि अगर गर्मी में ये लाचार सांप मर सकते हैं, तो एक दिन इंसान भी मारा जाएगा। मैंने कुछ करने की ठान ली। अपने गांव से 5 किमी की दूरी पर देवरी जाति के बुजुर्गों से मिला। उनसे सलाह लेने के लिए कि मुझे क्या करना चाहिए। उन्होंने कहा, दुनिया की सबसे ऊंची उष्ण घास लगाओ। मेरे नन्हें दिमाग में यह बात समझ में नहीं आयी। तब उन्होंने मुझे रेतीले द्वीप में लगाने के लिए 50 बांस के बीज और 20 बांस के झाड़ दिये। मैंने उन्हें वहीं लगा दिया, जहां सांपों को दफनाया गया था और हर रोज़ उसे पानी देने लगा। पानी देने के लिए मिट्टी का घड़ा और बर्तन का इस्तेमाल किया, जिसमें छोटा सुराख किया गया था। इस तरह बांस के पौधे बढ़ने लगे और पेड़ों का समूह जंगल का रूप लेता गया।
क्या कभी ऐसा भी लगा कि आप जो चाहते हैं, वह शायद न हो पाये? क्या किसी मोड़ पर हौसला टूटता नज़र आया?
– मैंने कहा न कि इस सफ़र को एक दायित्व समझ कर शुरू किया था। अंजाम के बारे में कभी नहीं सोचा, बस काम करता रहा। इस काम से एक अजीब-सी दिलचस्पी हो गयी थी। शायद इसीलिए कभी कोई बाधा नहीं आयी। मुझे पता था कि मैं क्या कर रहा हूं। पेड़ ऑक्सीजन देते हैं, जो हर प्राणी के जीवन के लिए आवश्यक है। अगर पेड़ नहीं रहे, तो इस धरती पर इंसान भी नहीं बचेगा और न कोई दूसरा जीव। इसलिए मैं पिछले लगभग 40 वर्षों से लगातार पौधे लगा रहा हूं, उनकी रक्षा कर रहा हूं और उन्हें जंगल में बदल रहा हूं। जैसे-जैसे जंगल आकार लेता रहा, जीव-जंतु यहां आते गये। 2008 में जब पहली बार हाथी आये, तो इसे अपने लिए खतरा मानते हुए लोगों ने जंगल को काटने का प्रयास भी किया। तब मैंने उनसे कहा कि अगर जंगल काटना है, तो उससे पहले मुझे काट दो। उन्हें समझाने की कोशिश की कि हाथी भी हमारी तरह अपना पेट भरने का प्रयास करते हैं। हमने अपने पेट के लालच में उन्हें बेघर कर दिया। भूल यह की मैंने कि अपने आगे उनकी समस्याओं को नहीं समझा, तभी वे हमारे घरों की ओर रुख करते हैं। लेकिन वे तो जंगली जानवर हैं, मनुष्य होने के नाते हमें उनका दर्द समझना चाहिए। अगर हाथी हमारी फसल खा जाते हैं या मकान को नुकसान पहुंचाते हैं, तो हम सभी को मिलकर सरकार से इसके समाधान हेतु मांग करनी चाहिए। गांववालों ने मेरी बात समझी। आज उनकी सोच में परिवर्तन आया है। वे हाथी को भगाते हैं, मगर जंगल काटने की बात नहीं करते। फिर भी यह ज़रूर कहूंगा कि हमारे यहां गांव में ग़रीबी है। एक परिवार की महीने की कमाई 3000 रुपये है। ऐसे में जब हाथी उनकी फसल खा जाते हैं या घरों को नुकसान पहुंचाते हैं, तो उनकी तकलीफें बढ़ जाती हैं।

आपके इस मिशन में सहयोग करने वाले और आपके हौसलों को तोड़ने वालों पर कुछ कहना चाहेंगे?
– शुरुआत के कई सालों तक तो मैं अकेले ही पौधे लगाता रहा। इसलिए शादी भी देर से हुई। 40 साल की उम्र के बाद। बाद में मेरी पत्नी भी मेरे इस काम में कभी-कभी मेरी मदद करती रही। सरकार की तरफ से भी बाद में पौधारोपण का काम हुआ। गांव के कुछ लोग भी इस काम में आगे आये। दरअसल, हमारे गांव में हर आदमी अपनी रोज़ी-रोटी के लिए संघर्ष कर रहा है। उसे दूसरे कामों के लिए समय नहीं मिल पाता। ऐसे में आप उनको किसी काम के लिए जबरदस्ती नहीं कर सकते।
आपने जंगल तो बसा दिया लेकिन जिस मक़सद से बसाया, उसमें ब्रह्मपुत्र नदी की बाढ़ से होने वाली तबाही को रोकना प्रमुख था। क्या वह समस्या खत्म हो गयी?
– मैंने पौधे लगाने की शुरुआत यह सोचकर नहीं की थी कि बाढ़ को रोकना है। लेकिन यह ज़रूर है कि पेड़ों की जड़ें मिट्टी को पकड़ कर रखती हैं, जिससे मिट्टी का बहाव रुकता है। मेरे पौधे लगाने से बाढ़ आना बंद हो गयी या धरती का बह जाना रुक गया, ऐसा तो नहीं मगर ज़रूर इससे हमारे लिए कई जीव-जंतुओं, पक्षियों, प्राणियों के जीने लायक एक धरती बस गयी। आज भी हमारा द्वीप खतरे से बाहर नहीं है। हम आशा करते हैं कि जल्द ही सरकार, ब्रह्मपुत्र नदी से संबंधित अधिकारीगण यहां जंगल बसा कर धरती को बचाने का काम शुरू करेंगे।
पर्यावरण संरक्षण के तौर पर आपकी पहल काबिले तारीफ़ है। क्या अपनी पहल की सफलता से देश के दूसरे हिस्सों में जागरूकता के लिए भी कुछ काम कर रहे हैं?
– मैं तो पूरी दुनिया को पर्यावरण के प्रति जागरूक करना चाहता हूं। मगर शुरुआत पहले अपने घर से ही होनी चाहिए। वैसे हम इस दिशा में भी काम कर रहे हैं और आशा करते हैं कि आगे चलकर ज़रूर हमें अपने मक़सद में कामयाबी मिलेगी। हमारी योजनाओं में बारिश के मौसम में धरती के हर कोने में वन-महोत्सव आयोजित करना शामिल है, जिसके तहत तीन घंटे का पौधारोपण, साथ मिलकर खाना-पीना, खेलना-कूदना और सांस्कृतिक कार्यक्रम शामिल है। मेरा विचार है कि पौधा लगाना एक मानसिक उल्लास का कार्य है। हम ऐसे कार्यक्रम को एक बड़ा रूप देकर प्रकृति प्रेम का नया कल्चर देना चाहते हैं। हम स्कूल-कॉलेजों में भी जाते हैं और बच्चों को पेड़ लगाने और उनकी रक्षा करने को प्रोत्साहित करते हैं। हम लोगों को प्रोत्साहित करते हैं कि वे हमारे पास आयें, हमारा जंगल देखें और हमारे साथ पौधे लगाना सीखें। हमारी योजना में दुनिया के हर हिस्से में प्रत्येक स्कूल में एडमिशन के दौरान छात्रों द्वारा एक पौधा लगाये जाने की बात भी है, जिसकी रक्षा करने और उसे बड़ा करने की ज़िम्मेदारी छात्र या स्कूल के अधिकारी पर होगी।
आपने जंगली जानवरों के जीवन और आजीविका का प्रबंध तो कर दिया, खुद आपके परिवार का गुज़ारा कैसे चलता है?
– जैसा मैंने बताया कि मैं मिशिंग जाति से हूं और पशुपालन हमारा पेशा है। मेरे पास गाय, भैंस और सुअर हैं। हम लोग खेती भी करते हैं और मछली भी पकड़ते हैं। गाय का दूध बेचता हूं, जिससे जीवन की ज़रूरतें पूरी होती हैं। बाज़ार से हम तेल, नमक और माचिस की डिबिया ही खरीदते हैं। बाकी आवश्यकताएं प्रकृति से पूरी होती हैं, जिससे हम कुछ लेते हैं तो उसे वापस करने की कोशिश भी करते हैं।
आपको काफी पुरस्कार मिले हैं, देश–विदेश के मीडिया में जगह भी। सबसे यादगार क्षण आपकी नज़र में?
– जी, पुरस्कार तो कई मिले हैं मुझे, मगर बहुत अहमियत नहीं रखते ये सब मेरे लिए। वैसे भी जब धरती ही नहीं रहेगी, तो पुरस्कारों का क्या होगा? लिहाजा, पर्यावरण और प्रकृति की रक्षा ही सही मायने में पुरस्कार है, जो हमें ज़िंदगी देती है। हां, जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के ‘फॉरेस्ट इंडिया’ पुरस्कार की वज़ह से मैं ज़रूर जनता के सामने आ सका। सबसे यादगार पल वह है, जब मुम्बई में एक मंच पर डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जी ने मेरे सिर पर हाथ रख कर कहा था कि आपने दुनिया का सबसे अच्छा काम किया है।

आपके मिशन को सरकार की तरफ से सहयोग मिला या नहीं? और अगर मिला तो किस तरह का सहयोग मिला?
– देश ने मुझे क्या दिया या देश मुझे क्या देगा, यह मेरी सोच कभी नहीं रही। हमेशा मेरी सोच यह रही कि मैं देश को क्या दे सकता हूं। अगर देश को हरा-भरा बनाने में किसी भी रूप में हमारी ज़रूरत होगी, तो मैं और मेरी टीम सरकार को हर तरह का सहयोग देने को तैयार है। साथ ही आशा करते हैं कि हर राज्य सरकार पर्यावरण संबंधी जागरूकता के लिए वन महोत्सव का आयोजन करे। इसे लोगों तक ले जाने के लिए हम भी सहयोग देने को तैयार हैं।
आप आदिवासी समुदाय से आते हैं। देश में आदिवासियों के सामने मुख्य समस्याएं क्या हैं? और इस दिशा में क्या किया जाना चाहिए?
– मेरे ख्याल से शिक्षा सबसे बड़ी ज़रूरत है आदिवासी समुदाय के लिए। उनके लिए उनके द्वार पर, उनकी ही भाषा में शिक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिए।
कुछ और कहना चाहेंगे? ऐसी बात, जो आप लोगों से कहना चाह रहे हों लेकिन माध्यम नहीं मिल पाया?
– पत्रकारों से कहना चाहूंगा कि पर्यावरण पर लिखना और लोगों को इसके प्रति जागरूक करना भी उनका दायित्व है। हम आशा करते हैं कि वन महोत्सव देश और दुनिया के हर स्थान पर मनाया जाए और इसके लिए मीडिया बहुत सहयोगी साबित हो सकता है।


