निजी और सरकारी क्षेत्र से ये बात बार बार उठती रही है कि भारत की अफसरशाही अंग्रेजों वाली ब्रिटिश सेवा के लिए बनाई गई थी। भारत की आजादी के बाद इसको खत्म कर देना चाहिए था।
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$cat_ID is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 378
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$category_count is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 379
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$category_description is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 380
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$cat_name is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 381
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$category_nicename is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 382
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$category_parent is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 383
आज़ादी से पहले गोरी हुकूमत ने जब भारत को पूरी तरह अपने शिकंजे में ले लिया। तो उसे महसूस हुआ कि उसे यहाँ से वसूली के लिए ऐसे भारतीय अफसरों की जरूरत है जो अंग्रेजी भाषा में पारंगत हों और भारतीयों से उनकी भाषा में बात कर सकता हो। इसीलिए अंग्रेजों ने इन्डियन सिविल सर्विसेज का गठन किया और कठिन परीक्षा पास करने वाले आईसीएस अफसरों को जिलों में तैनात करके उन्हें पदनाम दिया कलेक्टर का। यानी ऐसा अफसर जो सख्ती के साथ भारतियों से लगान वसूल सके।
आज़ादी के बाद इस सेवा को भारतीय हुक्मरानों ने शहीद भगत सिंह के शब्दों में ऐसे भूरे साहबों की जमात को बाकायदा मान्यता दे दी और सेवा का नाम आईएएस कर दिया। हालांकि आजादी के बाद भारत को ऐसे हृदयहीन प्रशासकों के बजाय विषय विशेषग्य प्रबंधकों की जरूरत थी जो व्यवस्थित तरीके से देश और देशवासियों को विकास की राह पर ले जा सकें।
देश में 15 अप्रैल 2019 को एक ऐसा ही फैसला किया गया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने उस दिन 9 लोगों को बिना परीक्षा, साक्षात्कार के सीधे आईएएस बनाया और सीनियर आईएएस की पोस्ट दे दी। लेटरल-एंट्री के तहत प्राइवेट सैक्टर से इन 9 प्रोफेशनल लोगों को सीधे ही सरकारी मंत्रालयों में संयुक्त सचिव बनाया गया जिन पर यूपीएससी की परीक्षा, इंटरव्यू के द्वारा आईएएस अधिकारी बनाए जाते रहे हैं। इस प्रक्रिया के तहत बीते हफ्ते मोदी ने दुबारा देश की कमान संभालने के बाद 40 और विषय विशेषज्ञों को सीधे आईएएस बना कर ब्यूरोक्रेसी की इस नयी परंपरा को और बल दे दिया गया।

प्राइवेट सेक्टर के पेशेवरों का स्तर वैसा ही हो, इसलिए निजी क्षेत्र के आईएएस के चयन की प्रक्रिया भी संघ लोक सेवा आयोग ने संचालित की। पहले चरण में जिन्हें आईएएस बनाया गया है वो हैं-अंबर दुबे (नागरिक विमानन), अरुण गोयल (वाणिज्य), राजीव सक्सेना (आर्थिक मामले), सुजीत कुमार बाजपेयी (पर्यावरण, जंगल और जलवायु परिवर्तन), सौरभ मिश्रा (वित्तीय सेवाएं) और दिनेश जगदाले (नई और नवकरणीय ऊर्जा)। इसके साथ ही सुमन प्रसाद सिंह को सड़क एवं परिवहन, हाइवे मंत्रालय में ज्वाइंट डायरेक्टर के तौर पर नियुक्ति मिली है। जहाजरानी मंत्रालय में भूषण कुमार को नियुक्ति दी गई है। साथ ही कृषि, सहयोग और किसान कल्याण मंत्रालय के लिए कोकली घोष को चुना गया है।
केंद्र सरकार के कार्मिक मंत्रालय ने जून 2018 में निजी क्षेत्र से ‘सीधी भर्ती’ व्यवस्था के जरिए ज्वाइंट सेक्रेटरी रैंक के पदों के लिए आवेदन मांगे थे जिसके लिए आवेदन करने की आखिरी तारीख 30 जुलाई 2018 रखी गई थी। तब मोदी सरकार की काफी आलोचना हुई थी। इसके तहत ऐसे लोगों को आवेदन करने योग्य माना गया है, जिन्होंने संघ लोकसेवा आयोग की सिविल सर्विस परीक्षा पास नहीं की। इन पोस्ट के लिए कुल 6,077 लोगों ने आवेदन किए थे, जिनमें से 9 जनों का चयन किया गया। इससे पहले भी कई अफसरों को इस तरह की जिम्मेदारी दी गई है, किंतु इतने बड़े पैमाने पर पहली बार निजी क्षेत्र से अफसरों का चयन हुआ है।
हालांकि ये कोई एकदम नयी परंपरा नहीं है और ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। इससे पहले जिनका चयन हुआ था उनमें प्रमुख निजी क्षेत्र के विशेषग्य डॉ. मनमोहन सिंह, मोंटेक सिंह अहूवालिया, बिमल जालान, विजय केलकर, आरवी शाही, परमेश्वरन अय्यर और राजेश कोटेचा जैसे लोगों के नाम शामिल हैं।
सब जानते हैं इनमें से डॉ. मनमोहन सिंह बाद में देश के वित्तमंत्री और प्रधानमंत्री बने। परमेश्वरन अय्यर अभी स्वच्छता सचिव हैं और राजेश कोटचा आयुष मंत्रालय संभालते हैं।
यही नहीं इससे पहले कई बार यूपीएससी को खत्म करने की मांग भी की जा चुकी है। निजी और सरकारी क्षेत्र से ये बात बार बार उठती रही है कि भारत की अफसरशाही अंग्रेजों वाली ब्रिटिश सेवा के लिए बनाई गई थी। भारत की आजादी के बाद इसको खत्म कर देना चाहिए था। सिंगापुर के निर्माता ‘ल्यू क्यू यान’ ने तो भारत की असफलता के लिए इन्हीं ब्यूरोक्रेट्स को जिम्मेदार ठहराया था। आधुनिक युग में किसी योजना या परियोजना के लिए उस कार्य में निपुण विशेषज्ञ की जरूरत होती है।

हमारे देश में सामान्यत: यह कहा जाता है कि जब शहरी विकास की बात आती है तो उस आदमी को चुनो, जो अनुभवी टाउन प्लानर हो। मगर सिविल सेवा में ऐसा नहीं होता है। विडंबना देखिए, जो आज शहरी मंत्रालय देखता है, वही कल यातायात को संभाल रहा होता है। फिर आजकल इंजिनीयरिंग और डाक्टरी की पढ़ाई पूरी करने वाले भी आईएएस की परीक्षा देते हैं क्योंकि इन विषयों को आईएएस में लेकर ज्यादा नंबर ले आते है और आईएएस बन भी जाते हैं।
पर ऐसा करके एक तो वो विशेषग्य डाक्टर या इंजिनियर पर सरकार और मां-बाप और सरकार द्वारा खर्च किये गए पैसे की बर्बादी करते हैं दूसरे अपने विषय से अलग विभागों के मुखिया बन कर बेअक्ली अफसरी झाड़ते हैं। जैसे मानव के शरीर को विशेषज्ञ डॉक्टर के द्वारा रिपेयर किया जाता है, उसी तरह से क्षेत्र के विशेषज्ञ को ही जिम्मेदारी सौंपी जानी चाहिए।
यूपीएससी की इस पहल से एक बात स्पष्ट है कि देश को आगे ले जाने के लिए विशेषज्ञ ही चाहिए। इसको लेकर भले ही आरक्षण विरोध शुरू हो जाए, या इस तरह से प्रचारित किया जाने लगे।
अब इस नयी परंपरा से आईएएस सेवा के उम्मीदवारों में खलबली मचना स्वाभाविक है और विपक्षी राजनितिक दलों ने भी इसे राजनितिक चश्मे से देखना शरू कर दिया है। उनका आरोप लगाया है कि अस्थायी प्रकृति की इस बहाली में आरक्षण के नियमों का पालन नहीं किया जाएगा तथा यह एक और संवैधानिक संस्था को बर्बाद करने की साजिश है। प्रशासनिक सुधार आयोग के अध्यक्ष रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री एम वीरप्पा मोइली कह रहे हैं कि यह संस्थाओं के भगवाकरण का वर्तमान सरकार का प्रयास है।
जब भी कुछ नया होगा तो ये सब तो होगा ही पर विरोध करने वाले ये क्यों भूल जाते हैं कि उन्ही के दल के प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हाराव के समय में इस सार्थक परंपरा का श्रीगणेश हुआ था। देशकाल परिस्थिति के हिसाब से आज त्वरित विकास और समावेशी कल्याण के लिए लालफीताशाही की जकड़ को ढीला करना समय की मांग है।


