नाज़ियों के आतंक के फैलने से पहले साल 1932 में दुनिया के सामने आई एक किताब “ब्रेव न्यू वर्ल्ड” एक ऐसे आतंकी राज का चेहरा सामने लाती है, जिसमें तकनीकी चालाकी से संचालित मनुष्यों की नस्ल अपने शोषण के लिए अपनी मर्ज़ी से हामी भरती है।
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मनुष्यों की नस्ल में तकनीकी चालाकी से दिमागी भ्रम को बढ़ा दिया जाए तो क्या होगा? सवाल बड़ा अनसुलझा-सा लग सकता है। लेकिन पहले हम बात करते हैं “ब्रेव न्यू वर्ल्ड” की और इसके लेखक के बारे में।
‘ब्रेव न्यू वर्ल्ड’, ‘ए हैपी वर्ल्ड’ और डिस्टॉपियन विचारक के लेखक, एल्डस हक्सले इंग्लैंड में जन्में एक प्रसिद्ध दार्शनिक थे। वे अपने समय के वैज्ञानिक और तकनीकी विकास से परिचित थे और वह यह भी समझते थे कि भविष्य में उसकी दिशा क्या होगी। उन्होंने ब्रेव न्यू वर्ल्ड के प्रकाशन के 30 साल बाद 1962 में दिए गए अपने कुछ सार्वजनिक में अपनी बेहद उम्दा समझ को साझा किया था। इसे उन्होंने सर्वश्रेष्ठ क्रांति का नाम दिया। यहां क्रांति शब्द का अभिप्राय आतंकी राज के मायनों में विकसित हुआ है। इनमें से एक भाषण 20 मार्च 1962 को अमेरिका के बर्कले लैंग्वेज़ सेंटर में हुआ था, जिसकी रिकार्डिंग बर्कले आर्काइव्स में उपलब्ध है। यहां हम उनके कुछ विचार रखना चाहेंगे जो उनके ही शब्दों में ज्यादा सार्थक नज़र आते हैं:
‘अगली पीढ़ी या उसके बाद, एक ऐसा औषधीय तरीका अपनाया जाएगा जिससे लोग अपनी ग़ुलामी से प्यार करने लगेंगे, बिना आंसुओं के एक तानाशाही स्थापित की जाएगी, कहना चाहिए कि पूरे समाज के लिए एक दुखविहीन अत्याचार स्थल बनाया जाएगा, जहां लोगों की आज़ादी दरअसल उनसे छीनी जाएगी, लेकिन वे उसका आनंद लेंगे, क्योंकि प्रचार या दिमागी भ्रम के ज़रिये उनके भीतर बग़ावत करने की इच्छा को ही ख़त्म कर दिया जाएगा, या औषधीय तरीकों से दिमागी भ्रम को बढ़ा दिया जाएगा।’
क्या यही चीज़ हम आज भारत में देख रहे हैं? इस सवाल का जवाब इतनी आसानी से मिलने वाला नहीं।
हक्सले ने भविष्य की तकनीक के ख़तरनाक इस्तेमाल को लेकर चेतावनी दी थी, ख़ासतौर पर प्रचार और दिमागी भ्रम को फैलाने के लिए संचार तकनीकों के बारे में उनका यह विचार था। भारत में हम इसे विध्वंसक स्तर पर इस्तेमाल होते हुए देख रहे हैं।
वहीं फ्रांसीसी दार्शनिक वॉल्तेयर ने असहमतों के बोलने की आज़ादी का पुरज़ोर समर्थन किया था, उन्होंने हर नागरिक के लिए इस आज़ादी को जरूरी बताया था। कबीर तो उनसे भी आगे निकल जाते हैं। वे कहते हैं कि अपनी समझ को साफ़ रखने के लिए हर मनुष्य को अपने नियरे एक आलोचक रखना चाहिए।
भारतीय सभ्यता की इस समझ से वे लोग अनजान हैं जो फिलहाल सत्तासीन हैं। जनहित में काम करने वाली हुकूमतों के भीतर भी मनमाने तरीके से काम करने और बिना किसी सवाल और जवाबदेही के सत्ता का इस्तेमाल करने की प्रबल इच्छा रहती है। अभिव्यक्ति की आज़ादी उनको कभी रास नहीं आती है। समय-समय पर ऐसी ताक़तों ने कमज़ोर या दंभ से भरे मौक़ों पर अपना यह बदसूरत और दमनकारी चेहरा दिखाया है।
अभिव्यक्ति की आज़ादी के अधिकार का इस्तेमाल करने वाले लोगों को अपने रास्ते से हटाने में ज्यादा वक्त नहीं लेती हैं ऐसी शक्तियां। और उन लोगों में खौफ भरने से नहीं हिचकतीं जो शायद कभी इन अधिकारों का इस्तेमाल कर सकते हैं।
यह सब कुछ बारी-बारी से होता है, ताकि उन लोगों को रोका जा सके जो अपने उपर हुए अत्यचारों को लेकर एक साझा अभियान चलाना चाहते हैं। इसकी शुरूआत उन लोगों से होती है जो सांस्कृतिक रूप से थोड़ा अलग नज़र आते हैं और जो इस वजह से राष्ट्र के उस विचार से सहमत नहीं हो पाते जिसे खोखली और संकुचित सरकारें आगे बढ़ाना चाहती हैं।
पहले किसी व्यक्ति विशेष और फिर विशेष समुदाय को मानवता के दुश्मन के तौर पर दिखाने के लिए वे उनके अलग होने का संदेह पैदा करते हैं और बाद में अपने समुदाय के भीतर अपने जनाधार को मजबूत करते हैं। इस तरह दुश्मनों की सूची लंबी होती चली जाती है। लूथरन पास्टर मार्टिन निमोलर ने अपनी एक कविता में इस प्रक्रिया को नाज़ी जर्मनी के संदर्भ में खूबसूरती से दिखाया है। उस कविता का कुछ अंश इस प्रकार है – पहले वे आए सोशलिस्टों के लिए और मैं चुप रहा क्योंकि मैं सोशलिस्ट नहीं था।
अभिव्यक्ति की आज़ादी और असहमति का अधिकार लोकतंत्र और मानव सभ्यता के विकास के लिए बहुत ज़रूरी है। कभी-कभी इन अधिकारों के बड़े समर्थक भी इन्हें बचाने के लिए आगे तो आते हैं लेकिन बिना किसी नतीजे पर पहुंचे खुद को अलग कर लेते हैं। दहशत और शर्म का ऐसा कोई पल हमारे उन अधिनायकों के लिए कभी नहीं आता, जब वे अलग तरह की जीवनशैलियों और अभिव्यक्ति की आज़ादी के ख़िलाफ़ जान लेने वाली भीड़ को लगा देते हैं।
बीसवीं सदी में, ताकतवर यूरोप और तीसरी दुनिया के देशों को एकाधिकारवादी और सर्वसत्तावादी शासनों की दहशत को झेलना पड़ा। अपने देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ाई लड़ रहे महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, डॉ अम्बेडकर और सरदार पटेल और टैगोर जैसे बहुतेरे जन बुद्धिजीवी इन अनुभवों को लेकर काफी चौकन्ने थे। इसलिए, उन्होंने अहिंसा और अभिव्यक्ति की आज़ादी में अपनी आस्था जताई। अपनी आंदोलनात्मक गतिविधियों के अलावा तिलक, गांधी, नेहरू ने ख़बरों और विचारों को केन्द्र में रखकर प्रकाशनों की स्थापना की और इसकी वजह से या तो उन्हें जेल जाना पड़ा या फिर उनके प्रकाशनों को बंद करवा दिया गया।
अभिव्यक्ति की आज़ादी और असहमति के अधिकार को दरकिनार करते हुए गढ़े हुए मुक़दमों, संस्थाओं का फंड रोकने, ब्लैकमेल और मालिकों पर असहमतों की आवाज़ और अभिव्यक्ति की आज़ादी को कुचला जा रहा है। लेकिन इससे ज़्यादा आश्चर्य की बात यह है कि मीडिया के एक बड़े हिस्से और जनता, ख़ासतौर पर शिक्षित मध्यवर्ग में मौजूदा सत्ताधारियों को सक्रिय समर्थन हासिल है। इसका एक कारण यह भी है कि प्रतिक्रियावादी सामाजिक ताक़तों ने कमज़ोर या दंभ से भरे मौक़ों पर अपना बदसूरत और दमनकारी चेहरा दिखाया है ।


