कई महीने पहले ही सामान्य मानसून के साथ ही बाढ़ की आशंका भी व्यक्त की गई थी, लेकिन बाढ़ की आशंका वाले राज्यों में वहां की सरकारों ने इस आपदा से निपटने के लिए ऐसी तैयारियां नहीं की, जिनसे लोगों को उफनती नदियों के प्रकोप से काफी हद तक बचाया जा सकता था।
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देश के कई राज्यों में इन दिनों बाढ़ के हालात हैं। पूर्वोत्तर राज्यों सहित बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों के कई इलाके बाढ़ के पानी से लबालब हैं। कहीं बांध या तटबंध टूट कर बाढ़ से होती तबाही को विकराल रूप दे रहे हैं। अब तक सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है और हजारों लोग बेघर हैं।
माना कि प्राकृतिक आपदाओं को पूरी तरह नहीं रोका जा सकता, किंतु उच्च स्तर की तकनीक और बेहतर प्रयासों से उसके प्रभावों को न्यूनतम अवश्य किया जा सकता है। इस साल कई महीने पहले ही सामान्य मानसून के साथ ही बाढ़ की आशंका भी व्यक्त की गई थी, लेकिन बाढ़ की आशंका वाले राज्यों में वहां की सरकारों ने इस आपदा से निपटने के लिए ऐसी तैयारियां नहीं की, जिनसे लोगों को उफनती नदियों के प्रकोप से काफी हद तक बचाया जा सकता था।अब तक सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है और हजारों लोग बेघर हैं।
चिंता की बात है कि विश्वभर में बाढ़ के कारण होने वाली मौतों का पांचवां हिस्सा भारत में ही होता है और बाढ़ की वजह से हर साल देश को हजारों करोड़ का नुकसान होता है। बाढ़ जैसी आपदाओं के चलते जान-माल के नुकसान के साथ-साथ लाखों हेक्टेयर क्षेत्र में फसलों के बर्बाद होने से देश की अर्थव्यवस्था पर इतना बुरा प्रभाव पड़ता है कि उस राज्य का विकास सालों पीछे चला जाता है।
पंजाब में पिछले दिनों घग्गर नदी पर बना बांध टूट जाने से करीब दो हजार एकड़ कृषि भूमि जलमग्न हो गई। बिहार के दरभंगा और मधुबनी में भी कमला बलान बांध कई जगहों से टूट गया व बड़े हिस्से को अपनी जद में ले लिया।
सरकारी तंत्र द्वारा हर साल बाढ़ जैसे हालात पैदा होने के बाद बांधों या तटबंधों की काम चलाऊ मरम्मत कर उन्हें भगवान भरोसे छोड़ दिया जाता है और अगले साल फिर बाढ़ का तांडव सामने आने पर प्राकृतिक आपदा की संज्ञा देने की कोशिशें हो जाती हैं। दरअसल हम अभी तक वर्षा जल संचयन के लिए कोई कारगर योजना नहीं बना सके हैं।
हम समझना ही नहीं चाहते कि सूखा और बाढ़ जैसी आपदाएं पूरी तरह एक-दूसरे से ही जुड़ी हैं और इनका स्थायी समाधान जल प्रबंधन की कारगर योजनाएं बना कर और उन पर ईमानदारीपूर्वक काम करके ही संभव है।
महाराष्ट्र हो या असम अथवा देश के अन्य राज्य, हर साल जब भी किसी राज्य में बाढ़ जैसी कोई आपदा एक साथ करोड़ों लोगों के जनजीवन को प्रभावित करती है तो केंद्र और राज्य सरकारों के मंत्री, मुख्यमंत्री बाढग़्रस्त क्षेत्रों के हवाई दौरे करते हैं और सरकारों द्वरा बाढ़ पीडि़तों के लिए राहत राशि देने की घोषणाएं की जाती हैं।
लेकिन जैसे ही बाढ़ का पानी उतरता है, सरकारी तंत्र बाढ़ के कहर को बड़ी आसानी से भुला देता है। पिछले 50 सालों में बाढ़ पर ही सरकारों ने 170 हजार करोड़ रुपए से भी ज्यादा धनराशि खर्च कर डाली।
लेकिन इतना कुछ होने के बाद भी अगर हालात सुधरने के बजाय साल दर साल बदतर होते जा रहे हैं तो समझा जा सकता है कि कमी आखिर कहां है! सीधा-सा अर्थ है कि बाढ़ प्रबंधन कार्यक्रम को संचालित करने वाले लोग अपना काम जिम्मेदारी, ईमानदारी और मुस्तैदी के साथ नहीं कर रहे थे।
बहरहाल, यदि हम चाहते हैं कि देश में हर साल ऐसी आपदाएं भारी तबाही न मचाएं तो हमें कुपित प्रकृति को शांत करने के सकारात्मक उपाय करने होंगे और इसके लिए प्रकृति के विभिन्न रूपों जंगल, पहाड़, वृक्ष, नदी और झीलों इत्यादि की महत्ता समझनी होगी।
वरना हमारी लापरवाही की भेंट चढ़कर प्रकृति नष्ट हो जाएगी। बाढ़ की विभीषिका हमारी लापरवाही की देन है। अंधाधुंध विकास के नाम पर हम प्रकृति के साथ जो खिलवाड़ कर रहे हैं, वही बदले में पा भी रहे हैं, मगर चेत एक बार भी नहीं रहे।


