पाकिस्तान सन 1947 से भारतीय कश्मीर पर कब्जा करने का प्रयास कर रहा है और अब भारत द्वारा पाक-अधिकृत कश्मीर को वापस लेने के प्रयासों के व्यापक अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव होंगे।
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$cat_ID is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 378
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$category_count is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 379
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$category_description is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 380
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$cat_name is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 381
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$category_nicename is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 382
Deprecated: Creation of dynamic property WP_Term::$category_parent is deprecated in /home4/krctib8j/public_html/hindi/wp-includes/category.php on line 383
हमारा सत्तारूढ़ राजनीतिक नेतृत्व और सैन्य प्रतिष्ठान दोनों ही दावा कर रहे हैं कि पाक-अधिकृत कश्मीर को शीघ्र ही पाकिस्तान के कब्जे से मुक्त करा दिया जाएगा। बुधवार को भारत के विदेश मंत्री ने संकेत दिया है कि भारत द्वारा पाक-अधिकृत कश्मीर को प्राप्त करना केवल समय की बात रह गयी है। कुछ दिन पूर्व सेनाध्यक्ष ने कहा ‘‘सेना पाक-अधिकृत कश्मीर को पाकिस्तान से वापस लेने के लिए तैयार है। यह निर्णय सरकार को करना है कि कब लिया जाए।’’
जबकि रक्षा मंत्री ने कहा ‘‘यदि पाकिस्तान के साथ कोई बात होगी तो वह केवल पाक-अधिकृत कश्मीर के बारे में होगी अन्य किसी बारे में नहीं।’’ और अंततः गृह मंत्री ने संसद में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक पेश करते हुए पाक-अधिकृत कश्मीर के बारे में नीतिगत बयान दिया। एक सांसद के प्रश्न के उत्तर में शाह ने जोर देकर कहा जब हम कश्मीर की बात करते हैं तो उसमें पाक-अधिकृत कश्मीर और अक्सई चिन भी शामिल हैं।

ये बयान केवल दिखावा नहीं। पाकिस्तान सन 1947 से भारतीय कश्मीर पर कब्जा करने का प्रयास कर रहा है और अब भारत द्वारा पाक-अधिकृत कश्मीर को वापस लेने के प्रयासों के व्यापक अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव होंगे। यह किस प्रकार हमारी विदेश नीति और सामरिक संबंधों को प्रभावित करेगा और इस कदम के क्या परिणाम होंगे? अंतर्राष्ट्रीय निकायों और राष्ट्रों के काूननों के बावजूद प्रबुद्ध राजनीतिक दार्शनिक इसया वलिंग की गैलिक प्रिंस की सूक्ति अभी भी लागू होती है और वह सूक्ति है कि ताकतवर का विशेषाधिकार है कि वह कमजोर से अपनी आज्ञा का पालन करवाता है और इसी के अनुसरण में इजराइल ने अपनी राजधानी तेल अवीब से जेरूुशलम स्थानांतरित करी जबकि जेरूशलम पर मुसलमान और यहूदी दोनों अपना दावा करते हैं और यह दोनों धर्मों का धार्मिक केन्द्र है। इसी के आधार पर चीन हांगकांग में लोकतंत्र की मांग कर रहे नागरिकों का दमन कर रहा है अैर 1979 में सोवियत संघ द्वारा अफगानिस्तान पर हमले के समय से यह महाशक्तियों की प्रतिद्वंदिता का मंच बन गया है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहां पर सैन्य शक्ति या मजबूत राजनीतिक गठबंधन के माध्यम से कोई देश अपने लक्ष्य प्राप्त करता है।
पक-अधिकृत कश्मीर के मामले में भारत सामरिक गठबंधन या सैन्य कार्यवाही अथवा दोनों मार्ग अपना सकता है। गृह मंत्री, विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री के बयानों से लगता है कि दोनों मार्ग खुले हुए हैं और सैन्य कार्यवाही के साथ साथ कूटनीति भी चलती है। भारत देर सवेर पाक-अधिकत कश्मीर को वापस लेने के लिए कदम उठाएगा और भारत के कदम के पक्षों में क्या कारक होंगे? इसमें सबसे महत्वूपर्ण कारक अमरीका द्वारा पाक-अधिकृत कश्मीर के बारे में भारत का समर्थन करना है।
इस बात की संभावना है कि अमरीका भारत के पक्ष में होगा। अमरीका अफगानिस्तान से अपनी सेना वापस बुला रहा है और वहां पर उसे काफी नुकसान हो रहा है। उसके लिए यह एक और वियतनाम बन गया है और इसलिए वह चिंतित है। डोनाल्ड ट्रंप ने चुनावी वायदा किया था कि वह अफगानिस्तान में अमरीकी सैनिकों की संख्या कम करेगा और 2020 में दूसरे कार्यकाल के लिए चुनाव लडने से पूर्व वे इस वायदे को पूरा करना चाहते हैं किंतु तभी ऐसा कदम उठा सकते हैं जब वहां तालिबान पर अंकुश लगाने के लिए कोई विकल्प हो। इसके लिए अमरीका पाकिस्तान पर निर्भर है किंतु अमरीका पाकिस्तान के पाखंड और दोगलेपन को समझ गया है इसलिए अमरीका ने पाकिस्तान को सैन्य सहायता देना लगभग बंद कर दिया है। साथ ही पाकिस्तान को चीन का संरक्षण प्राप्त है।
उक्त भू-राजनीतिक परिदृश्य ने पाकिस्तान के बारे में अमरीका की सरदर्दी बढा दी है। डोनाल्ड ट्रंप और अमरीकी सामरिक नेतृत्व के पास भारत के पक्ष में आने के सिवाय कोई विकल्प नहीं है ताकि तालिबान को निष्क्रिय करने में मदद मिले और इस क्षेत्र में चीन की वर्चस्ववादी महत्वाकांक्षा पर अंकुश लगे। इस बात की पूरी संभावना है कि पाक-अधिकृत कश्मीर को वापस लेने में अमरीका भारत का समर्थन करेगा क्योंकि इससे भारत की अफगानिस्तान तक सीधी पहुंच हो जाएगी और ऐसा ही मत सुब्रमणियम स्वामी ने व्यक्त किया है जो अमरीकी दृष्टिकोण से अवगत हैं। अमरीका चाहता है कि भारत अफगानिस्तान में सैन्य हस्तक्षेप करे किंतु भारत ने अभी तक इस मामले में अपनी अनिच्छा व्यक्त की है।
बदले भूसामरिक परिदृश्य में हो सकता है भारत अमरीका की इस राय को माने और उसके बदले पाक- अधिकृत कश्मीर के संबंध में अमरीका का समर्थन मांगे। कश्मीर के पूर्ण एकीकरण के बाद भारत पाक- अधिकृत कश्मीर को वापस लेने का लक्ष्य रखेगा क्योंकि इससे चीन और पाकिस्तान की तुलना में भारत को सैन्य लाभ मिलेगा। इस पर चीन की प्रतिक्रिया का अंदाजा लगाना कठिन है। चीनी अवसरवादी होते हैं और बहुत कम लोग चीन की सोच को समझ पाए हैं। इसलिए यूरोपीय और अमरीकी देश चीनी अर्थव्यवस्था का निर्माण कराने पर खेद व्यक्त करते हैं क्योंकि यह विश्व शांति और सुरक्षा के लिए संभावित राजनीतिक खतरा बन गया है। अन्य देशों के भूभाग पर सर्वाधिक दावा चीन का है।
इसलिए भारत को चीन को अलग थलग करने के लिए मेहनत करनी होगी। मेरी राय है कि भारत कई बार चीन भारत संबंधों के बारे में लपरवाह बन जाता है। चीन के साथ इसी तरह की कूटनीति जारी रहेगी किंतु हमें यह समझना होगा कि चीन भारत के लिए संभावित खतरा है। इस क्षेत्र में एक अन्य हितधारक रूस है। भारत ने रूस के साथ पुरानी मैत्री विकसित करने का प्रयास किया है। कश्मीर मुद्दे पर भी रूस ने भारत का समर्थन किया है और हम यह मान सकते हैं कि पाक-अधिकृत कश्मीर में भारत की कार्यवाही को वह अपना पूर्ण समर्थन देगा।
कूटनीतिक दृष्टि से भारत को पाक अधिकृत कश्मीर की वापसी के लिए सैनिक और कूटनयिक मार्ग अपनाना होगा। उसे विश्व को समझाना होगा कि पूरा कश्मीर कानूनी रूप से भारत का है और इसका उल्लेख कश्मीर के भारत में विलय पत्र में है जिस पर तत्कालीन महाराजा ने हस्ताक्षर किए थे और कश्मीर विधान सभा ने उसका समर्थन किया था और इसी तरह अन्य रजवाडे भी भारत में शािमल हुए थे। पाकिस्तान का कश्मीर पर कोई दावा नहीं है।
हमारी उदारता और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के प्रति आदर को देखते हुए कुछ लोग कहेंगे कि नेहरू ने इस मुद्दे पर विवाद की गुंजाइश पैदा की। अब भारत इस अपूर्ण ऐतिहासिक कार्य को पूरा करना चाहता है। दूसरी ओर कश्मीर के राज्यपाल की तरह आप यह भी कह सकते हैं कि पाक-अधिकृत कश्मीर के लोग भारत के साथ मिलना चाहते हैं। इसलिए भारत को भारत में तथा पाक-अधिकृत कश्मीर में कश्मीरी भाई बहनों पर ध्यान रखना होगा। कश्मीरी लोगों को यह अहसास होना चाहिए कि उनका भविष्य भारत के साथ है इसलिए कश्मीर में शीघ्रातिशीघ्र सामान्य स्थिति बहाल की जानी चहिए और भारत इस दिशा में निरंतर कदम उठा रहा है।


